भाषणों में वह आरोप कहां साबित हो रहा
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः लद्दाख के प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता और सुधारक सोनम वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत की गई निवारक हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस हुई। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार के तर्कों पर गंभीर सवाल उठाए। न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि सरकार वांगचुक के भाषणों का जरूरत से ज्यादा और गलत अर्थ निकाल रही है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने दलील दी थी कि सोनम वांगचुक के भाषणों और लद्दाख में हुई हालिया हिंसा के बीच एक सीधा संबंध है। सरकार का दावा था कि उनके शब्दों ने जनता को उकसाने का काम किया, जिससे क्षेत्र की शांति भंग हुई। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा, आप उनके भाषणों को जरूरत से ज्यादा पढ़ रहे हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि किसी व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आजादी को केवल इस आधार पर नहीं कुचला जा सकता कि सरकार को उनके शब्द चुभ रहे हैं। पीठ ने सवाल किया कि क्या वास्तव में उन भाषणों में हिंसा का कोई प्रत्यक्ष आह्वान था या सरकार केवल अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए एक गठजोड़ की कहानी गढ़ रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा कि क्या उनके पास ऐसे कोई ठोस सबूत हैं जो साबित कर सकें कि वांगचुक ने व्यक्तिगत रूप से हिंसा की योजना बनाई या भीड़ को उकसाया। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि निवारक हिरासत एक असाधारण कदम है, जिसका उपयोग केवल अत्यंत गंभीर परिस्थितियों में होना चाहिए, न कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने वाले किसी प्रतिष्ठित नागरिक के खिलाफ।
यह मामला अब एक बड़े संवैधानिक प्रश्न की ओर मुड़ गया है: क्या सरकार किसी कार्यकर्ता की लोकप्रियता और उसके प्रभाव को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताकर उसे अनिश्चित काल तक बंद रख सकती है? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से संकेत मिलता है कि अदालत नागरिक स्वतंत्रता के पक्ष में खड़ी है। केंद्र को अब इस मामले में अधिक विस्तृत और ठोस हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है, जिसमें हिंसा और वांगचुक के बयानों के बीच के कथित संबंधों का पुख्ता प्रमाण देना होगा।