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ग्रेट निकोबार परियोजना को एनजीटी की हरी झंडी

हर स्तर पर विरोध और पर्यावरण संबंधी चिंता दरकिनार

  • कई प्रमुख शर्तों का भी उल्लेख है

  • लोगों की चिंता जैव विविधता को लेकर

  • वर्षावनों के कटाई  की भरपाई नहीं होगी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल सहित 72 हजार से 90 हजार करोड़ रुपये की महात्वाकांक्षी बुनियादी ढांचा परियोजना को मंजूरी दे दी है। एनजीटी की छह सदस्यीय पीठ, जिसकी अध्यक्षता जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव कर रहे थे, ने सोमवार को अपने आदेश में कहा कि इस परियोजना के लिए दी गई पर्यावरणीय मंजूरी में पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं और इसके रणनीतिक महत्व को देखते हुए इसमें हस्तक्षेप करने का कोई ठोस आधार नहीं है।

यह विशाल परियोजना लगभग 169 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली होगी और इसमें हिंद महासागर के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार मार्ग पर स्थित यह बंदरगाह भारत को वैश्विक शिपिंग हब के रूप में स्थापित करेगा। एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (सैन्य-नागरिक दोहरे उपयोग के लिए) और एक एकीकृत स्मार्ट सिटी का निर्माण। 459  एमवीए क्षमता का गैस और सौर आधारित हाइब्रिड पावर प्लांट।

मलक्का जलडमरूमध्य के पास इसकी भौगोलिक स्थिति भारत के लिए सैन्य निगरानी और व्यापारिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह स्थान कोलंबो, सिंगापुर और पोर्ट क्लैंग जैसे प्रमुख बंदरगाहों से लगभग समान दूरी पर है, जिससे भारत विदेशी बंदरगाहों पर अपनी निर्भरता कम कर सकेगा।

पर्यावरण और जनजातीय सुरक्षा के कड़े प्रावधान एनजीटी ने स्पष्ट किया कि हालांकि परियोजना को अनुमति दी गई है, लेकिन पर्यावरण मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि तटीय विनियमन क्षेत्र के नियमों का उल्लंघन न हो। अधिकरण ने विशेष रूप से निम्नलिखित प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण पर जोर दिया है। इनमें लेदरबैक समुद्री कछुआ, निकोबार मेगापोड (पक्षी), खारे पानी के मगरमच्छ और निकोबार मकाक (बंदर) शामिल है। इसके अलावा मैंग्रोव का पुनरुद्धार और कोरल रीफ (प्रवाल भित्तियों) का वैज्ञानिक विधियों से ट्रांसलोकेशन। द्वीप की मूल निवासी शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों के अधिकारों और उनकी जीवनशैली की रक्षा।

इस फैसले के बावजूद, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और कांग्रेस नेता जयराम रमेश जैसे राजनेताओं ने इसे निराशाजनक बताया है। उनका तर्क है कि 130 वर्ग किलोमीटर के कुंवारी वर्षावनों का विनाश और लाखों पेड़ों की कटाई से होने वाले पारिस्थितिक नुकसान की भरपाई किसी भी सुरक्षा उपाय से संभव नहीं है। उन्होंने आशंका जताई है कि इससे द्वीप की अद्वितीय जैव विविधता और आदिम जनजातियों के अस्तित्व पर संकट आ सकता है।

एनजीटी ने निर्देश दिया है कि केंद्र सरकार को तटीय कटाव रोकने और रेतीले समुद्र तटों को बचाने के लिए निरंतर निगरानी करनी होगी, क्योंकि ये कछुओं के प्रजनन के लिए महत्वपूर्ण हैं।