स्थानीय निकाय के चुनाव से बड़े नेताओं की बढ़ गयी परेशानी
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होर्डिंग वॉर और डिजिटल अखाड़ा
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बड़े नेताओं के लिए धर्मसंकट की स्थिति
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प्यार-दुलार का दांव और अनिश्चितता
राष्ट्रीय खबर
रांची: झारखंड की राजधानी रांची में स्थानीय निकाय चुनावों की औपचारिक घोषणा होते ही राजनीतिक गलियारे और शहर की सड़कें चुनावी रंग में रंग गई हैं। आधिकारिक तौर पर नामांकन की प्रक्रिया भले ही अभी रफ्तार पकड़नी बाकी हो, लेकिन चौक-चौराहों, सोशल मीडिया की गलियों और चाय की दुकानों पर संभावित प्रत्याशियों की एक बड़ी फौज खड़ी नजर आने लगी है।
शहर के मुख्य चौराहों से लेकर मोहल्लों की छोटी गलियों तक, होर्डिंग्स और पोस्टरों के जरिए दावेदारी ठोंकने का सिलसिला शुरू हो गया है। दिलचस्प बात यह है कि मैदान में केवल वे ही लोग नहीं हैं जो चुनाव लड़ना चाहते हैं, बल्कि एक बड़ी जमात उन समर्थकों की भी है जो किसी संभावित प्रत्याशी के पक्ष में अपनी तस्वीर चमका रहे हैं। सोशल मीडिया के पहलवान भी अपनी लोकप्रियता का वजन तौलने के लिए डिजिटल मैदान में उतर चुके हैं। वे लाइक, शेयर और कमेंट्स की फौज के जरिए अपनी ताकत का एहसास अपनी पार्टी के आलाकमान को कराने की जुगत में हैं।
निकाय चुनावों की यह गहमागहमी खुद को बड़ा नेता कहने वालों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है। स्थिति दोधारी तलवार पर चलने जैसी है। दरअसल, विधानसभा और लोकसभा चुनावों के दौरान यही छोटे स्तर के कार्यकर्ता और स्थानीय नेता वोट मैनेजमेंट का खेल करते हैं और बड़े नेताओं की जीत सुनिश्चित करते हैं। अब जब इन कार्यकर्ताओं ने खुद के लिए टिकट की दावेदारी पेश की है, तो बड़े नेताओं के लिए एहसान चुकाने का वक्त आ गया है।
मुसीबत यह है कि वार्ड एक है और दावेदार एक दर्जन। यदि नेता किसी एक का समर्थन करता है, तो बाकी ग्यारह की नाराजगी अगले विधानसभा या लोकसभा चुनाव में भारी पड़ सकती है। यह वही दुकानदारी है जिसे सालों से वोट मैनेज करने के नाम पर चलाया जाता रहा है, लेकिन अब इस दुकानदारी का हिसाब चुकता करना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।
फिलहाल, बड़े नेता हर दावेदार के साथ प्यार और दुलार का दांव खेल रहे हैं। दरबार में पहुंचने वाले हर प्रत्याशी को आश्वासन दिया जा रहा है, लेकिन अंदरूनी तौर पर डर और संदेह कायम है। जानकार मानते हैं कि बिजली के खंभों पर पोस्टर लगाने की जो लड़ाई अभी शुरू हुई है, वह आने वाले दिनों में और उग्र होगी। चुनावी विश्लेषकों का कहना है कि यह प्यार-दुलार का दांव तभी तक कारगर है जब तक टिकटों का अंतिम फैसला नहीं हो जाता। एक बार नाम तय होने के बाद, जो नाराजगी उभरेगी, उसका खामियाजा बड़े नेताओं को भविष्य के बड़े चुनावों में भुगतना पड़ सकता है।