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सरकार की असलियत खोलती मनरेगा की समाप्ति

यह वर्ष महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा), जो कि प्रमुख ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम है, के पुनर्गठन के साथ समाप्त हो रहा है। इस महीने, एक नए कानून ने इसका नाम बदलकर विकसित भारत-रोजगार और आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी वीबी जी राम जी दिया है।

इसमें किए गए व्यापक संशोधनों ने महत्वपूर्ण चिंताओं को जन्म दिया है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पूरी तरह बदल जाने के जिस तर्क पर ये बदलाव आधारित हैं, उससे कई लोग असहमत हैं। नाम बदलने से लेकर इसे एक केंद्र प्रायोजित योजना के रूप में पुनर्गठित करना (जिसमें राज्यों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा), इसकी कार्यप्रणाली का नीचे-से-ऊपर के बजाय ऊपर-से-नीचे होना, और इसके मूल स्वरूप को बदलना।

मनरेगा का मूल स्वभाव एक खुली और बिना शर्त रोजगार गारंटी का था, जिसे अब विकसित भारत 2047 के अनुरूप विकास और बुनियादी ढांचा निर्माण की रणनीति में बदल दिया गया है, जिसमें राज्यों के लिए मानक आवंटन और संरचित योजना शामिल है। इन आशंकाओं और उनके आर्थिक महत्व को समझना आवश्यक है। चिंताओं को समझने के लिए महत्वपूर्ण बदलावों पर एक नज़र डालना जरूरी है। वैधानिक गारंटी बनी हुई है, जिसके तहत अकुशल शारीरिक कार्य के प्रावधान को प्रति परिवार 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है।

व्यस्त कृषि मौसम के दौरान काम को 60 दिनों तक रोका जा सकता है, जबकि पहले ऐसी कोई वैधानिक रोक नहीं थी। केंद्र-राज्य वित्तपोषण का अनुपात 90:10 से बदलकर 60:40 कर दिया गया है, जो इसे केंद्र प्रायोजित योजनाओं की श्रेणी में लाता है। हालांकि यह अधिकार-आधारित है, लेकिन काम की मांग को अब नियम-आधारित वित्तीय आवंटन और नियोजित डिजाइन से जोड़ दिया गया है।

मौजूदा रोजगार गारंटी परिषदों के ऊपर केंद्र और राज्य स्तर की स्टीयरिंग कमेटियों की एक नई परत जोड़ी गई है, जो फंडिंग वितरण, निगरानी और अंतर-मंत्रालयी समन्वय की सिफारिश करेंगी। ग्राम सभाओं द्वारा सुझाए गए सार्वजनिक कार्यों के बजाय अब इसे विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं के रूप में नियोजित किया जाएगा, जिसे पीएम गति शक्ति और जियोस्पेशियल सिस्टम के साथ एकीकृत किया जाएगा।

श्रम-प्रधान कार्यों के बजाय अब जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण बुनियादी ढांचे और जलवायु शमन जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। अब बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, जियो-टैगिंग, जीपीएस निगरानी और एआई-सक्षम ऑडिट को वैधानिक बना दिया गया है। पिछले पांच वर्षों (वित्त वर्ष 2021-25) के आंकड़ों पर नजर डालें तो देशभर में प्रति परिवार औसतन 50.3 कार्य दिवसों की मांग की गई, जबकि 2014-20 के दौरान यह औसत 46.6 दिन था।

महामारी के दौरान मनरेगा ने अपनी प्रशासनिक सरलता और लचीलेपन के कारण संकटग्रस्त लोगों को सहायता प्रदान करने में अमूल्य भूमिका निभाई। इसकी स्व-चयन विशेषता ने सबसे कमजोर वर्गों तक पहुंच सुनिश्चित की। भारत जैसे देश में, जहां अनौपचारिकता बहुत अधिक है और कोई सार्थक सामाजिक सुरक्षा जाल नहीं है, मनरेगा ने एक महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच के रूप में कार्य किया है।

शोध बताते हैं कि सार्वजनिक कार्यों के माध्यम से यह लचीली रोजगार गारंटी सूखे और बड़े आर्थिक झटकों का मुकाबला करने, संकट और गरीबी को कम करने में सक्षम रही है। नए बदलाव इस सुरक्षा जाल को राज्य के नेतृत्व वाले विकास और बुनियादी ढांचे पर केंद्रित योजना में परिवर्तित करते हैं।

संभवतः, अब यह मंदी-रोधी और बीमा के कार्यों को कम और विकास के कार्यों को अधिक प्राथमिकता देगा। व्यस्त मौसम में काम को निलंबित करने का आदेश समानता और दक्षता के बीच संतुलन बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है, क्योंकि पहले मनरेगा मजदूरी की एक न्यूनतम सीमा तय कर देता था, जिससे निजी क्षेत्र में श्रम लागत बढ़ने की शिकायतें आती थीं। जमीनी स्तर के विकेंद्रीकृत ढांचे से केंद्रीकृत और डिजिटल ढांचे की ओर बढ़ना इसे अधिक विवेकाधीन बनाता है।

इससे उन परिवारों के बाहर होने की संभावना बढ़ सकती है जिनके पास कनेक्टिविटी या बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण की बाधाएं हैं—जो आमतौर पर समाज के सबसे हाशिए पर रहने वाले लोग होते हैं। सबसे गहरा प्रभाव राज्यों पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ का है। महामारी के बाद से राज्य सरकारें पहले से ही उच्च कर्ज और ब्याज भुगतान के बोझ से दबी हुई हैं।

ऐसे में केंद्र प्रायोजित योजना के तहत अधिक वित्तीय योगदान देने की उनकी क्षमता संदिग्ध लगती है। अंततः, सार्वजनिक कार्यों पर आधारित रोजगार गारंटी के इस कायाकल्प को सरकारों की उभरती प्राथमिकताओं के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए, जो अब विशिष्ट वर्गों (जैसे महिलाओं) को बिना शर्त नकद हस्तांतरण की ओर झुक रही हैं। ये योजनाएं अक्सर चुनाव-प्रेरित होती हैं और आर्थिक उतार-चढ़ाव से कटी होती हैं। यद्यपि ये वित्तीय रूप से बोझिल हो सकती हैं, लेकिन चुनावी परिणामों के मामले में इनका लाभ अधिक दिखता है।