एसआईआर की प्रक्रिया में बुजुर्गों को कष्ट
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केंद्रों पर कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं
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अधिक उम्र के लोग कतार में खड़े
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व्हील चेयर पर आ रहे हैं मतदाता
राष्ट्रीय खबर
कोलकाताः पश्चिम बंगाल में इन दिनों मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन को लेकर एक भावुक और तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है। चुनाव आयोग की इस कवायद का उद्देश्य मतदाता सूची को त्रुटिहीन बनाना और कथित अवैध मतदाताओं की छंटनी करना है, लेकिन जमीनी स्तर पर यह प्रक्रिया बुजुर्गों और बीमार नागरिकों के लिए एक शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का कारण बन गई है।
राज्य के विभिन्न जिलों जैसे हुगली, दुर्गापुर और कोलकाता के बेहाला क्षेत्र से ऐसी विचलित करने वाली खबरें आ रही हैं, जहाँ 80-90 वर्ष के बुजुर्ग, जो देश की आजादी के बाद से लगभग हर चुनाव में मतदान करते आए हैं, आज अपनी ही नागरिकता के प्रमाण के लिए कतारों में खड़े हैं।
कई बुजुर्गों का कहना है कि दशकों तक लोकतंत्र के उत्सव में हिस्सा लेने के बाद, जीवन के अंतिम पड़ाव पर अपनी पहचान साबित करना उनके आत्मसम्मान को गहरी चोट पहुँचाता है। सुनवाई केंद्रों पर बुनियादी सुविधाओं का अभाव इस संकट को और गहरा रहा है। चिलचिलाती धूप या कड़ाके की ठंड के बीच, कई केंद्रों पर बैठने के लिए पर्याप्त कुर्सियाँ या अलग कतारों की व्यवस्था नहीं देखी गई। व्हीलचेयर पर आए बीमार व्यक्ति, साँस की नली (ऑक्सीजन ट्यूब) लगे मरीज और लाठी के सहारे चलते अति-वृद्ध नागरिकों को भी केंद्र तक बुला लिया गया।
कई मामलों में, केवल नाम की स्पेलिंग में मामूली गलती या 2002 की मतदाता सूची से सीधा लिंक न मिल पाने के कारण लोगों को समन भेजा गया है। पुराने दस्तावेजों को संभाल कर रखना ग्रामीण और अनपढ़ आबादी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
चुनाव आयोग का सुधारात्मक कदम व्यापक आलोचना और मानवीय आधार पर बढ़ते दबाव के बाद, चुनाव आयोग ने अपनी गाइडलाइन्स में सुधार किया है। अब यह निर्णय लिया गया है कि 85 वर्ष से अधिक उम्र के मतदाताओं की सुनवाई उनके घर पर ही की जाएगी। गर्भवती महिलाओं और गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों के लिए भी घर पर ही सत्यापन की सुविधा दी जाएगी। मतदाता अब आधार कार्ड सहित 12 अन्य मान्यता प्राप्त दस्तावेजों का उपयोग अपनी पहचान साबित करने के लिए कर सकते हैं।
आयोग के सुधारों के बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों में सूचना के अभाव के कारण अभी भी डर का माहौल है। बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा स्पष्ट जानकारी न दिए जाने के कारण लोग इस डर में जी रहे हैं कि कहीं उनका नाम मतदाता सूची से काट न दिया जाए। घुसपैठियों को बाहर निकालने के नाम पर शुरू हुई यह प्रक्रिया अब आम नागरिकों के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन गई है। मतदाता सूची को शुद्ध करना एक संवैधानिक आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में मानवीय संवेदनाओं और बुजुर्गों की गरिमा का ध्यान रखना भी उतना ही अनिवार्य है।