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मोदी का असली हथियार: चुनाव आयोग

राहुल गांधी एक बार फिर स्वच्छ मतदान की मांग कर चुके हैं। भारत में विपक्षी दल, और यहाँ तक कि भाजपा भी जब सत्ता से बाहर थी, अक्सर ईवीएम धोखाधड़ी को लेकर मुखर रहे हैं। हालांकि, विपक्ष आज तक ईवीएम में छेड़छाड़ का कोई ठोस और विश्वसनीय उदाहरण पेश नहीं कर पाया है।

अक्सर चुनावी नतीजों के बाद अपनी हार की निराशा छिपाने के लिए ईवीएम पर उंगली उठाना एक राजनीतिक रिवाज बन गया है। लंबे समय तक चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रियाओं के अनुभव से लगता है कि विपक्ष ने अब जाकर असली समस्या को पहचाना है, और वह है—मतदाता सूची में हेरफेर।

टी.एन. शेषन के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद भारतीय चुनाव प्रणाली में जो सकारात्मक बदलाव आए, उनमें पारदर्शी मतदाता सूची सबसे महत्वपूर्ण थी। उनके कार्यकाल में ही फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र की शुरुआत हुई, जिससे चुनाव के दौरान प्रशासन और सरकार द्वारा की जाने वाली धांधली पर लगाम लगी।

विडंबना यह है कि शेषन को उनके कुछ कड़े फैसलों के कारण तानाशाह तक कहा गया, जबकि उन्होंने वे सभी निर्णय संविधान के दायरे में रहकर ही लिए थे। गुजरात दंगों के बाद जब राज्य प्रशासन ने मुस्लिम मतदाताओं के नाम सूची से हटाए थे, तब तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त जे.एम. लिंगदोह ने चुनाव टाल दिए थे।

उस समय मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी द्वारा लिंगदोह और आयोग पर किया गया व्यक्तिगत हमला आज भी एक काला अध्याय है। तब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मतदाता सूची तैयार करना और चुनाव की तारीखें तय करना आयोग का संप्रभु अधिकार है।

पिछले कुछ वर्षों में चुनाव आयोग की भूमिका पर जो विवाद बढ़ा है, उसकी जड़ में यही असीमित और निर्विवाद संप्रभु शक्ति है। अंततः संस्थान की शक्ति का उपयोग करने वाले व्यक्ति ही तय करते हैं कि वे निष्पक्ष रहेंगे या सत्ता के पक्षधर। 2019 के बाद से भारतीय चुनाव आयोग की कार्यशैली में आमूल-चूल परिवर्तन आया है।

आयोग का मूल कर्तव्य 18 वर्ष से ऊपर के नागरिकों का नाम दर्ज करना और उन्हें मतदान के लिए प्रोत्साहित करना है। लेकिन बिहार में विशेष गहन संशोधन के नाम पर जो कार्य शुरू हुआ है, वह चिंताजनक है। आयोग अब मतदाताओं से उनकी नागरिकता साबित करने को कह रहा है।

कानूनन, मतदाता सूची से विदेशियों के नाम हटाना पुलिस और खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट के आधार पर होना चाहिए, न कि इसे आयोग का मुख्य चुनावी कार्यक्रम बना दिया जाना चाहिए। भारत में एक बहुत बड़ा वर्ग दस्तावेज़ विहीन है। बिहार के जिन 65 लाख संदिग्ध मतदाताओं की बात हो रही है, उनमें से 90 प्रतिशत पिछड़े और वंचित समाज से हैं।

भाजपा और आयोग जानते हैं कि अमीर वर्ग का नाम कटने पर तीखी प्रतिक्रिया होगी, लेकिन दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के मामले में ऐसा नहीं होगा। भाजपा अब नागरिकता को देशभक्ति और हिंदुत्व के साथ जोड़कर एक कृत्रिम अनिश्चितता पैदा कर रही है ताकि अपने कोर वोट बैंक के सहारे सत्ता पर पकड़ बनाए रख सके।

नरेंद्र मोदी ने अपनी सत्ता को दीर्घायु बनाने के लिए जिन संस्थानों को हथियार बनाया है, उनमें चुनाव आयोग प्रमुख है। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से आयोग निष्पक्ष रेफरी के बजाय भाजपा के गोलकीपर की भूमिका में नजर आता है। आयोग की निष्पक्षता का पतन इस बात से समझा जा सकता है कि 1951 के बाद पहली बार दो आयुक्तों को कार्यकाल के बीच में पद छोड़ना पड़ा।

अशोक लवासा ने मोदी और शाह के खिलाफ चुनावी आचार संहिता उल्लंघन के मामलों में कार्रवाई चाही थी, लेकिन मुख्य आयुक्त सुनील अरोड़ा ने उन्हें रोक दिया, जिसके बाद लवासा को हटना पड़ा। वहीं 2024 के चुनाव से ठीक पहले अरुण गोयल ने भी बंगाल जैसे राज्यों में लंबी चुनावी प्रक्रिया पर आपत्ति जताते हुए इस्तीफा दे दिया।

मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को भी पलट दिया जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में देश के मुख्य न्यायाधीश को शामिल करने की बात कही गई थी। अब नई समिति में प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित एक मंत्री का बहुमत है, जिससे विपक्ष की आवाज बेमानी हो गई है।

यहाँ तक कि 1961 के चुनावी नियमों में संशोधन कर बूथ के भीतर सीसीटीवी फुटेज देखने का अधिकार भी सीमित कर दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 324 की संप्रभुता का उपयोग यदि सत्ता की सेवा के लिए होने लगे, तो लोकतंत्र का भविष्य संकट में पड़ जाता है। अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग की इन निर्बाध शक्तियों की सीमा पर नए सिरे से विचार किया जाए।