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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का मामला नहीं टलेगा

चुनाव निपटने के तुरंत बाद सक्रिय हुआ शीर्ष अदालत

  • इसे टालने का अनुरोध किया गया था

  • अदालत ने कहा यह ज्यादा महत्वपूर्ण है

  • सरकार ने कानून बदलकर फेरबदल किया

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की निष्पक्षता और चुनाव आयोग की स्वायत्तता से जुड़े एक बेहद संवेदनशील मामले में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की उस विशेष अपील को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को बदलने वाले नए कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई टालने की मांग की गई थी। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए इस विवादास्पद कानून के तहत चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है, जिसे लेकर संवैधानिक गलियारों में तीखी बहस छिड़ी हुई है।

केंद्र सरकार का पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत से सुनवाई स्थगित करने का आग्रह किया। उन्होंने तर्क दिया कि वह फिलहाल सबरीमाला मंदिर मामले में महिलाओं के प्रवेश संबंधी फैसले की समीक्षा कर रही नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष व्यस्त हैं। मेहता ने अनुरोध किया कि चूंकि यह मामला महत्वपूर्ण है, इसलिए वह याचिकाकर्ताओं की दलीलें स्वयं सुनना चाहते हैं और इसके लिए सुनवाई को अगले सप्ताह तक के लिए टाल दिया जाना चाहिए।

हालांकि, जस्टिस दीपांकर दत्ता की पीठ ने इस अनुरोध को स्वीकार करने से साफ इनकार कर दिया। जस्टिस दत्ता ने इस मामले को अत्यंत महत्वपूर्ण करार देते हुए स्पष्ट किया कि इस सुनवाई की तारीख एक महीने पहले ही निर्धारित कर दी गई थी। अदालत ने केंद्र को याद दिलाया कि संवैधानिक महत्व के विषयों को व्यक्तिगत व्यस्तताओं के कारण अनिश्चितकाल के लिए नहीं छोड़ा जा सकता।

जस्टिस दत्ता ने एक समाचार पत्र की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बेहद तीखी टिप्पणी भी की। उन्होंने कहा कि जिस सबरीमाला मामले की दुहाई देकर समय मांगा जा रहा है, उसके बारे में स्वयं नौ न्यायाधीशों की पीठ के प्रेक्षण  सामने आए हैं कि उस जनहित याचिका को शायद प्राथमिक स्तर पर स्वीकार ही नहीं किया जाना चाहिए था। उन्होंने दो टूक कहा कि एक ऐसे मामले के लिए, जिसे शायद तरजीह नहीं मिलनी चाहिए थी, इस सबसे महत्वपूर्ण सुनवाई को नहीं रोका जा सकता।

गौरतलब है कि मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए चयन पैनल में प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता के साथ मुख्य न्यायाधीश का होना अनिवार्य है। लेकिन केंद्र के नए कानून ने मुख्य न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर लिया है, जिससे चयन प्रक्रिया में सरकार का पलड़ा भारी हो गया है।

विपक्ष का आरोप है कि इस बदलाव के बाद से चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में पक्षपात बढ़ा है। हालिया चुनावों में आयोग के कई फैसलों को लेकर राजनीतिक दलों और नागरिक समाज ने खुलकर नाराजगी जताई है। कई मंचों पर यह आरोप भी लगाए गए हैं कि चुनाव आयोग अब एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के बजाय सत्तारूढ़ दल के ‘एजेंट’ के रूप में काम कर रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की यह त्वरित सुनवाई देश में चुनावी शुचिता को बहाल करने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।