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यूरोपिय संघ ने बैठक के बाद दिल खोलकर सहायता की

युद्धपीड़ित यूक्रेन को नब्बे अरब यूरो की मदद

ब्रुसेल्सः यूक्रेन और रूस के बीच जारी लंबे संघर्ष के बीच, यूरोपीय संघ ने एक अत्यंत साहसिक और ऐतिहासिक वित्तीय निर्णय लिया है। ब्रुसेल्स में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक के बाद, संघ के 27 सदस्य देशों ने यूक्रेन की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने के लिए 90 अरब यूरो के विशाल ऋण पैकेज को मंजूरी दी है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब यूक्रेन को अपनी सैन्य जरूरतों के साथ-साथ बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए तत्काल धन की आवश्यकता है।

वित्तीय संकट और सहायता की अनिवार्यता विगत कई महीनों से यूक्रेन की वित्तीय स्थिति चिंताजनक बनी हुई थी। युद्ध के कारण देश का राजस्व संग्रह न्यूनतम स्तर पर पहुँच गया है, जबकि रक्षा व्यय में कई गुना वृद्धि हुई है। बुनियादी नागरिक सेवाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा और पेंशन के भुगतान के लिए कीव को बाहरी मदद की सख्त जरूरत थी। 90 अरब यूरो की यह राशि न केवल युद्ध के मोर्चे पर सैनिकों की रसद और हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित करेगी, बल्कि सर्दियों के दौरान तबाह हुए बिजली घरों और हीटिंग प्रणालियों को ठीक करने में भी जीवन रक्षक साबित होगी।

रणनीतिक बदलाव और रूसी संपत्तियों का मुद्दा इस पैकेज की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सीधे यूरोपीय संघ के सामूहिक बजट से वित्तपोषित किया जाएगा। पिछले कई महीनों से यूरोपीय नेता इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या पश्चिमी बैंकों में जमी की गई रूसी संपत्तियों से होने वाले लाभ का उपयोग यूक्रेन की मदद के लिए किया जाए। हालांकि, इस पर कानूनी पेचीदगियों और कुछ सदस्य देशों की चिंताओं के कारण पूर्ण सहमति नहीं बन सकी। अंततः, यूक्रेन को अधर में न छोड़ने के संकल्प के साथ, यूरोपीय संघ ने अपने स्वयं के संसाधनों और बजटीय आवंटन का उपयोग करने का वैकल्पिक और अधिक कठिन रास्ता चुना।

यूरोपीय एकजुटता बनाम आंतरिक चुनौतियां इस फैसले का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि यह ऋण यूक्रेन को आने वाले दो वर्षों तक युद्ध के मोर्चे पर डटे रहने और अपनी प्रशासनिक सेवाओं को सुचारू रखने में मदद करेगा। इस फैसले से रूस को यह कड़ा संदेश गया है कि यूरोप पीछे हटने वाला नहीं है और वह लंबी खींचतान के लिए तैयार है। हालांकि, इस प्रक्रिया में आंतरिक मतभेद भी सतह पर आए। हंगरी जैसे कुछ देशों ने, जिनका रुख रूस के प्रति नरम माना जाता है, इस प्रस्ताव पर कड़ी आपत्ति जताई थी और वीटो का डर दिखाया था। लेकिन अंततः, संघ ने अपनी प्रक्रियात्मक शक्तियों का उपयोग करते हुए इसे बहुमत के आधार पर पारित कर दिया। यह निर्णय वैश्विक पटल पर यह सिद्ध करता है कि लोकतांत्रिक यूरोप अपने पड़ोस में संप्रभुता की रक्षा के लिए भारी वित्तीय बोझ उठाने को भी तैयार है।