बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण से ठीक एक दिन पहले, कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 2024 के हरियाणा चुनावों पर ध्यान केंद्रित किया, जहाँ उनकी पार्टी को सत्तारूढ़ भाजपा के हाथों चौंकाने वाली हार का सामना करना पड़ा था। लोकसभा में विपक्ष के नेता ने चुनावी रोल डेटा का हवाला देते हुए दावा किया कि लगभग 25 लाख प्रविष्टियाँ जाली (नकली) थीं, और उन्होंने भारत के चुनाव आयोग (ईसीआई) पर भाजपा के साथ मिलीभगत करके उसकी जीत सुनिश्चित करने का आरोप लगाया।
राहुल गांधी द्वारा लगाया गया वोट चोरी का यह अब तक का सबसे बड़ा आरोप है—जिसे कुछ लोग उनका तथाकथित एच-बम कह सकते हैं—और यह चुनाव आयोग पर उनका सबसे मजबूत हमला भी है। इस साल की शुरुआत में, उन्होंने दावा किया था कि कर्नाटक के महादेवपुरा और अलंद विधानसभा क्षेत्रों में भी ऐसी अनियमितताएँ हुई थीं।
अगस्त में उनकी दो सप्ताह लंबी वोटर अधिकार यात्रा का उद्देश्य बिहार के मतदाताओं को ऐसी संभावित धोखाधड़ी के प्रति सतर्क करना था। राहुल गांधी का यह नवीनतम आरोप, जो सीधे तौर पर एक संवैधानिक निकाय की अखंडता पर सवाल उठाता है, भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण प्रस्तुत करता है।
25 लाख जाली प्रविष्टियों का दावा, यदि सत्य है, तो यह केवल एक चुनावी धांधली का मामला नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रक्रिया में जनता के विश्वास को गंभीर रूप से हिला देने वाला एक बड़ा कृत्य है। जाली मतदाता प्रविष्टियों का अर्थ है कि लाखों वैध मतदाताओं के अधिकारों को संभावित रूप से कमजोर किया गया है, या फिर चुनावों को एक सुनियोजित तरीके से प्रभावित किया गया है।
हरियाणा चुनाव में भाजपा की जीत के बाद यह आरोप लगाना, जहाँ कांग्रेस एक मजबूत वापसी की उम्मीद कर रही थी, चुनावी परिणामों पर सवाल खड़ा करता है। राहुल गांधी द्वारा प्रस्तुत डेटा की सटीकता की सार्वजनिक जांच की आवश्यकता है, लेकिन यह दावा करने का कार्य स्वयं में चुनाव आयोग पर एक बड़ा दबाव डालता है।
अब यह पूरी तरह से चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है कि वह इन आरोपों का खंडन करने के लिए ठोस, पारदर्शी और सार्वजनिक रूप से सत्यापन योग्य डेटा प्रस्तुत करे। चुनाव आयोग को अपनी प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए, केवल एक औपचारिक बयान जारी करने के बजाय, कई कदम उठाने पड़ सकते हैं।
आयोग को उन डेटा बिंदुओं को सार्वजनिक करना चाहिए जिनके आधार पर राहुल गांधी ने 25 लाख प्रविष्टियों को जाली घोषित किया है। इसके समानांतर, आयोग को अपने डेटा की अखंडता साबित करने के लिए एक विस्तृत, जिला-वार सत्यापन प्रक्रिया का प्रदर्शन करना चाहिए। आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, ईसीआई एक स्वतंत्र, प्रतिष्ठित संस्था या न्यायपालिका के किसी सेवानिवृत्त सदस्य से चुनावी रोल का ऑडिट (लेखापरीक्षा) करवा सकता है, जिससे जनता का विश्वास बहाल हो सके।
कर्मचारियों पर लगे मिलीभगत के आरोपों की जांच: यदि राहुल गांधी का तात्पर्य है कि ईसीआई के कर्मचारी जानबूझकर भाजपा को लाभ पहुँचा रहे थे, तो इन विशिष्ट आरोपों की गहन और त्वरित आंतरिक/बाहरी जांच आवश्यक है। भविष्य के चुनावों में ऐसी आशंकाओं को दूर करने के लिए, आयोग को अपनी मतदाता सूची शुद्धिकरण की प्रक्रिया और इसके लिए उपयोग की जाने वाली तकनीक (जैसे डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर) की प्रभावशीलता को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना चाहिए।
राहुल गांधी ने इस आरोप को बिहार चुनाव से ठीक पहले उठाकर एक रणनीतिक राजनीतिक दाँव खेला है। उनकी वोटर अधिकार यात्रा पहले से ही मतदाताओं को इस विषय पर जागरूक करने पर केंद्रित थी, और अब वोट चोरी का सीधा आरोप, विशेष रूप से हरियाणा जैसे राज्य के संदर्भ में, विपक्ष को भाजपा और ईसीआई के बीच कथित मिलीभगत के नैरेटिव (कथा) को मजबूत करने का मौका देता है।
यह आरोप कांग्रेस और विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ लोकतंत्र की रक्षा के एक व्यापक मंच पर एकजुट होने में मदद कर सकता है। हालांकि, यदि ये आरोप निराधार साबित होते हैं, तो यह राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी की विश्वसनीयता को भी गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा सकता है। संक्षेप में, राहुल गांधी के इस एच-बम ने चुनाव आयोग को कटघरे में खड़ा कर दिया है।
ईसीआई की आने वाली प्रतिक्रिया न केवल हरियाणा के चुनावी रिकॉर्ड का बचाव करेगी, बल्कि यह भी निर्धारित करेगी कि भारत के मतदाता भविष्य में चुनावी प्रक्रिया की अखंडता पर कितना भरोसा करते हैं। वरना ब्राजील की लड़की की तस्वीर के साथ करीब दो दर्जन मतदाताओं की मौजूदगी यह दर्शाती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर राहुल गांधी जो आरोप लगा रहे हैं, उनमें दम है और खुद ज्ञानेश गुप्ता अथवा दूसरे चुनाव आयुक्त अपने लिए भविष्य की बहुत बड़ी परेशानी मोल ले रहे हैं।