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आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली.. .. .. ..

बिहार चुनाव का माहौल गर्म है। लगातार शब्दों की मर्यादा घट रही है और लोग एक दूसरे पर कीचड़ फेंक रहे हैं। गनीमत है कि यह कीचड़ होली तक पहुंचा है। वइसे लगता है कि यह आगे चलकर लालू प्रसाद की कपड़ा फाड़ होली तक भी पहुंच जाएगा। लेकिन इसका असली मजा तो पब्लिक ले रही है। पहली बार उसे दोनों तरफ की मोर्चाबंदी का बहुत लाभ दिख रहा है। दोनों तरफ से वादों की बारिश हो रही है।

यह अलग बात है कि इन वादों में से कितने पूरा होंगे और इन वादों को पूरा करने के लिए पैसा कौन देगा, यह सवाल अनुत्तरित है। लोग इस तरीके से बोल रहे हैं मानों उनके पास अपना ही कुबेर का खजाना है। भाई अगर कुबेर का खजाना भी है तो चुनाव के वक्त पर ही क्यों बोल रहे हो। राज्य में गरीब है, यह जानते थे तो पहले भी लोगों की मदद कर सकते थे।

वइसे एक बात तो है कि बिहार का पॉलिटिकल सेंस जरूरत से ज्यादा अच्छा है। गांव के चौपाल पर बैठा आदमी भी आपको गाजा युद्ध, रूस के यूक्रेन पर हमला अथवा डोनाल्ड ट्रंप के नोबल पुरस्कार पर ज्ञान बांचता दिख जाएगा। पूछने पर पता चलेगा कि जनाब काम कुछ नहीं करते हैं और दिन भर चौपाल पर बैठकर इंटरनेशनल पॉलिटिक्स पर ही बात किया करते हैं।

इस बीच यह भी साफ हो गया है कि काफी समय से राहुल गांधी जिस जाति जनगणना की बात करते आ रहे थे, उसका असर बिहार के गांव देहात में है और इस वजह से खास तौर पर भाजपा को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। गांव के लोग अब भाजपा नेताओँ से काम का हिसाब मांग रहे हैं।

दूसरी तरफ सोशल मीडिया के विस्तार की वजह से अब मेन स्ट्रीम मीडिया को भी वह सवाल पूछना पड़ रहा है, जिससे उन्हें परहेज रहा है। मीडिया में गोदी मीडिया करार दिये गये लोगों की भी भारी फजीहत हो रही है।

यह भी दिख रहा है कि बेचारे मोदी जी पहली बार दबाव में है। दिल्ली में छठ के लिए अलग तालाब बनवाया तो आम आदमी पार्टी वालों ने भंडाफोड़ कर दिया। राहुल ने खुली चुनौती दे दी तो अब उन्हें कहना पड़ रहा है कि यह उनका नहीं छठी मैया का अपमान है।

दूसरी तरफ जनसुराज वाले प्रशांत किशोर ने भाजपा के राज्य स्तरीय नेताओं का बाजा बजा रखा है। बेचारे हाफिडेविट वाले उप मुख्यमंत्री चाहकर भीकुछ नहीं बोल पा रहे हैं क्योंकि बार मीडिया उनसे उनकी शैक्षणिक योग्यता की बात पूछने लग जाती है। कुछ मिलाकर चारों तरफ कीचड़ होली का माहौल है।

इसी बात पर वर्ष 1971 की हिंदी फिल्म कटी पतंग का एक बहुत ही लोकप्रिय होली गीत याद आ रहा है। इस गीत को किशोर कुमार और लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। इस गीत को आनंब बक्षी ने लिखा था और संगीत में ढाला था आरडी बर्मन ने। इसे राजेश खन्ना और आशा पारेख पर फिल्माया गया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

ओये बबुआ होली है!

ओये सा रा रा रा रा होये होये होये होये

हाँ आज ना छोड़ेंगे, बस हमजोली

खेलेंगे हम होली, खेलेंगे हम होली

चाहे भीगे, चाहे भीगे तेरी चुनरिया

चाहे भीगे रे चोली, खेलेंगे हम होली

होली है!

अपनी-अपनी किस्मत है ये

कोई हँसे कोई रोए

हाँ, कोई हँसे कोई रोए

हो… रंग से कोई अंग भिगोए रे

कोई असुवन से नैन भिगोए

ओ असुवन से नैन भिगोए

रहने दो ये बहाना, क्या करेगा ज़माना

हो ओ तुम हो कितनी भोली, अरे खेलेंगे हम होली

आज ना छोड़ेंगे, बस हमजोली

खेलेंगे हम होली, खेलेंगे हम होली

ओ हो ना ना ना ना ना हो

ऐसे नाता तोड़ गए हैं

मुझसे ये सुख सारे

हाँ, मुझसे ये सुख सारे

जैसे जलती आग किसी बन में

छोड़ गए बंजारे

हो ओ छोड़ गए बंजारे

दुःख है एक चिंगारी

भर के ये पिचकारी

हो ओ आई मस्तों की टोली, अरे खेलेंगे हम होली

आज ना छोड़ेंगे, बस हमजोली

खेलेंगे हम होली, खेलेंगे हम होली

चाहे भीगे, चाहे भीगे तेरी चुनरिया

चाहे भीगे रे चोली, खेलेंगे हम होली

खेलेंगे हम होली…

आज ना छोड़ेंगे, बस हमजोली

खेलेंगे हम होली…

अब चुनाव निपट जाए तो पता चलेगा कि आखिरकार ऊंट किस करवट बैठता है। हां यह तय है कि अगर इस बार बिहार की बाजी एनडीए के हाथ से निकली तो दिल्ली सरकार का पाया भी कमजोर साबित हो जाएगा। वैसे में इस कुर्सी को समर्थन दे रहे लोग कितने दिनों तक उसे मजबूती से थाम सकेंगे, यह नया सवाल खड़ा हो जाएगा। इस पूरे माहौल में सबसे अधिक फजीहत अगर किसी की हुई तो वह हैं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। बेचारे बेटी और दामाद तक के चक्कर में फंस गये और सरकार बदली तो उनका स्थान कहां होगा, यह राहुल गांधी पहले ही बता चुके हैं।