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ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर अलग अलग रणनीति

छोटे दलों से संपर्क साध चुकी है भाजपा

  • कांग्रेस की रणनीति विस्तार से चर्चा हो

  • विपक्ष को पता है प्रस्ताव का परिणाम

  • टीएमसी ने नोटिस पर साइन नहीं किया

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: केंद्र सरकार लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने की तैयारी कर रही है। सरकार की रणनीति विपक्षी गठबंधन इंडिया के भीतर मौजूद छोटे दलों को कांग्रेस के रुख से अलग करने की है। इस महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर सदन में चर्चा और मतदान 9 मार्च, 2026 को होना तय हुआ है।

सत्ता पक्ष इस अवसर का लाभ उठाकर विपक्ष की एकता में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्टों के अनुसार, विपक्षी खेमे में राय बंटी हुई है। जहाँ कांग्रेस आक्रामक रुख अपनाए हुए है, वहीं कुछ अन्य दलों के नेता टकराव की राह से बचना चाहते हैं। विशेष रूप से, तृणमूल कांग्रेस ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, जो विपक्ष के भीतर असहमति का स्पष्ट संकेत है।

विपक्षी नेताओं के एक वर्ग का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का उत्तर देते समय सदन में अनुपस्थित रहने के बाद उनका विरोध दर्ज हो चुका है। इसे राहुल गांधी के भाषणों के दौरान हुए व्यवधान और उनके अंश हटाए जाने के बदले के रूप में देखा गया। अब इस समूह को लगता है कि ओम बिरला के खिलाफ मोर्चा खोलने का कोई विशेष रणनीतिक लाभ नहीं है, क्योंकि वे अगले तीन वर्षों तक सदन की अध्यक्षता करेंगे और इस प्रस्ताव के सफल होने की संभावना बेहद कम है।

दूसरी ओर, कांग्रेस का तर्क है कि सदन के भीतर पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली को उजागर करने के लिए यह चर्चा अनिवार्य है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने स्पष्ट किया कि स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना एक दुर्लभ कदम है, लेकिन जब तक स्पीकर कुर्सी पर न हों और इस मुद्दे पर खुली बहस न हो, तब तक उनकी शिकायतों का समाधान नहीं होगा।

विपक्षी सूत्रों के अनुसार, यह निर्णय 26 दलों की बैठक में दो दिनों के विचार-विमर्श के बाद लिया गया था। हालांकि स्पीकर के खिलाफ नोटिस के लिए केवल दो हस्ताक्षरों की आवश्यकता होती है, लेकिन अपनी ताकत दिखाने के लिए कांग्रेस ने 118 सांसदों के हस्ताक्षर एकत्र किए हैं।