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एवरीथिंग इज़ पॉलिटिक्स.. .. .. ..

फिलहाल बाकी सब कुछ भूल जाइये क्योंकि देश की सत्ता और सत्ता के विरोधी दोनों यही चाहते हैं कि आप रोटी की परेशानी को याद ना करें और सिर्फ बिहार चुनाव पर आपका ध्यान रहे। मानों यह चुनाव ना हुआ भारत के भविष्य का फैसला हो गया। धुआंधार मीटिंग, जनसभा और लंबे लंबे भाषण।

बिहार विधानसभा चुनाव की घोषणा होते ही, पटना की हवा में अचानक रोमांस और ड्रामा दोनों घुल जाते हैं, पर यह रोमांस लैला-मजनू वाला नहीं, बल्कि कुर्सी-मोह वाला है। आने वाला यह महासमर किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं होगा, जहाँ हर सीन में प्लॉट ट्विस्ट, हर डायलॉग में ज़हरीला व्यंग्य और अंत में एक जबरिया गठबंधन ज़रूर होता है।

हमारे माननीय नेतागण, जिन्होंने पिछले पाँच सालों में अपनी बयानबाज़ी से सोशल मीडिया को कंटेंट की कमी नहीं होने दी, अब एक बार फिर मैदान में उतरेंगे। हर नेता की चाल ऐसी होगी, मानो वह शतरंज का नहीं, बल्कि ताश का बादशाह बनने जा रहा हो, जिसे पता है कि बाज़ी पलटने के लिए जोकर ही काम आता है।

घोषणापत्रों की बात करें, तो यह चुनाव हँसी के फव्वारे लेकर आएगा। एक दल कहेगा कि वह बिहार को कैलिफ़ोर्निया बना देगा, जबकि दूसरा दल तुरंत पलटवार करेगा कि वह इसे जापान बना देगा, ताकि दोनों वादों में कोई मेल ही न रहे और जनता एशिया में ही कहीं खोई रहे।

हर पार्टी 10 लेन की एक्सप्रेसवे बनाने का वादा करेगी—जो शायद सिर्फ़ हेलीकॉप्टर उतारने के काम आ सके, क्योंकि ज़मीन पर अतिक्रमण और गड्ढे अपनी जगह कायम रहेंगे। घोषणा होगी कि हर गाँव में आईआईटी और एम्स की शाखा खुलेगी, भले ही मौजूदा स्कूलों में टाट-पट्टी और शिक्षकों की कमी से छात्र परेशान हों।

सबसे बड़ा हास्यबोध यहाँ है। नेता कहेंगे, हमने लाखों नौकरी दी! और जनता सोचेगी, दी या देने का सपना दिखाया? इस चुनावी मौसम में रोज़गार वह अदृश्य शक्ति है, जिसे सब महसूस करना चाहते हैं, पर कोई पकड़ नहीं पाता। बिहार चुनाव का असली मज़ा आता है गठबंधन के ड्रामे में। यहाँ नेतागण दोस्ती ऐसे निभाते हैं, जैसे वे फेविकोल का जोड़ हों, जो थोड़ा सा तापमान बढ़ते ही टूट जाता है।

एक दल दूसरे दल पर जंगलराज का आरोप लगाएगा, और दूसरा दल पहले पर अंकलराज का। इस आरोप-प्रत्यारोप की कॉमेडी ऑफ़ एरर्स में दर्शक (यानी जनता) सिर्फ़ ताली बजाने या सर पकड़कर बैठने के लिए बचेगी।

इसी बात पर एक कम चर्चित गीत की याद आ रही है। फिल्म आर्ची  के इस गीत को लिखा है अलोयसियस मेंडोन्सा ने। इसे शंकर एहसान लॉय और जावेद अख्तर ने सुरों में बांधा है और इसे डोरोथी रो, विशाल डडलानी तथा शंकर महादेवन ने अपना स्वर दिया है। यूं तो यह कम चर्चित फिल्म का गीत है पर अभी के मौके पर यह सटीक बैठता है। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

लाइफ की हर एक बात में है पॉलिटिक्स

सुबह-शाम, दिन-रात में है पॉलिटिक्स

जो क्लास में टीचर हैं

क्या देते वो लेक्चर हैं

बोलो, ये डिसाइड कौन करता है?

को-एड सारे स्कूल में हो कि नहीं?

गर्ल्स मिनीस्कर्ट्स में जा सकती हैं कहीं

क्या लूज़, क्या टाइट है

क्या रॉन्ग, क्या राइट है

बोलो, ये डिसाइड कौन करता है?

आर्ची! आर्ची!

यू कांट जस्ट लिव योर लाइफ फॉर किक्स

आर्ची! आर्ची!

एवरीथिंग इज़ पॉलिटिक्स

क्या स्पोर्ट्स इम्पोर्टेन्ट हैं

या अनइम्पोर्टेन्ट हैं?

क्या बाई एनी चांस है म्यूज़िक या डांस ज़रूरी

जैसे फिजिक्स या केमिस्ट्री?

ड्राइविंग लाइसेंस १८ की एज में क्यूँ?

१७ तक हम बचपन की केज में क्यूँ?

ये जो भी डिसिप्लिन है

सोचे-समझे बिन है

बोलो, ये डिसाइड कौन करता है?

आर्ची! आर्ची!

यू कांट जस्ट लिव योर लाइफ फॉर किक्स

आर्ची! आर्ची!

एवरीथिंग इज़ पॉलिटिक्स

अब मैंने जाना है

अब मैंने सोचा है

कि सारे बातों के कम-से-कम मीनिंग दो

सोचो तो, इस मिस्ट्री की हिस्ट्री

आर्ची! आर्ची!

यू कांट जस्ट लिव योर लाइफ फॉर किक्स

आर्ची! आर्ची!

एवरीथिंग इज़ पॉलिटिक्स

आर्ची! आर्ची!

आई कांट जस्ट लिव माई लाइफ फॉर किक्स

आर्ची! आर्ची!

एवरीथिंग, एवरीथिंग, एवरीथिंग, एवरीथिंग

एवरीथिंग इज़ पॉलिटिक्स

कुल मिलाकर, बिहार का आगामी विधानसभा चुनाव सिर्फ़ एक राजनीतिक घटना नहीं है; यह एक भव्य लोक-नाट्य है। यहाँ हर नागरिक एक दर्शक है, जो इस उम्मीद में टिकटॉक वीडियो बना रहा है कि शायद अगली सरकार उसकी टूट चुकी सड़कों या उसके बेरोज़गार भतीजे को अपने कैमरे में कैद कर ले, ताकि कम से कम वीडियो वायरल होने का तो रोज़गार मिल सके!

अब देखना यह है कि इस बार बिहार की जनता ईगो को कुर्सी देती है, या रोज़गार की तलाश में किसी नए जोकर पर दाँव लगाती है। अंत में, जीत चाहे किसी की भी हो, असली मज़ा तो मीडिया कवरेज और मिले हुए वादों पर हँसने में ही आएगा।