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प्रधानमंत्री फ्रांकोइस बायरो के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित

फ्रांस में इमैनुएल मैक्रों की सरकार पर संकट के बादल

  • मात्र नौ महीने तक काम कर पाये बायरो

  • किसी भरोसेमंद को यह पद सौंपना होगा

  • वामपंथी दलों का समर्थन जुटाना कठिन

पेरिस: फ्रांस में, राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को एक कठिन राजनीतिक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में, संसद ने प्रधानमंत्री फ्रांकोइस बायरो के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया, जिसके बाद बायरो को नौ महीने के कार्यकाल के बाद इस्तीफा देना पड़ा। इस घटना ने मैक्रों के सामने नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति की चुनौती पेश कर दी है, साथ ही उन्हें यह भी तय करना है कि क्या वह कोहैबिटेशन (जब राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अलग-अलग दलों से होते हैं) का रास्ता अपनाएंगे।

मैक्रों के करीबी सूत्रों के अनुसार, उनकी प्राथमिकता किसी ऐसे भरोसेमंद मंत्री को प्रधानमंत्री बनाना है जो उनके साथ लंबे समय से काम कर रहा हो। इस दौड़ में न्याय मंत्री गेराल्ड डारमैनिन और रक्षा मंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नु के नाम सबसे आगे हैं। हालांकि, ये दोनों नेता दक्षिणपंथी माने जाते हैं, जिससे वामपंथी दलों को साथ लाना मुश्किल हो सकता है, जबकि सरकार को समर्थन के लिए वाम दलों की जरूरत है। इसी वजह से स्वास्थ्य मंत्री कैथरीन वॉट्रिन को भी एक संभावित और संतुलित उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है।

एक और विकल्प यह है कि मैक्रों किसी ऐसे व्यक्ति को चुनें जो वामपंथी हो, लेकिन सोशलिस्ट पार्टी (ढर) का हिस्सा न हो। इस तरह के उम्मीदवारों में राफेल ग्लक्समैन और पूर्व प्रधानमंत्री बर्नार्ड काजेनेव शामिल हैं। इसके अलावा, वित्त मंत्री एरिक लोम्बार्ड भी एक मजबूत दावेदार हैं। एक सूत्र ने कहा कि अब मुद्दा यह नहीं है कि मैक्रों किसे चाहते हैं, बल्कि यह है कि कौन इस मुश्किल राजनीतिक संतुलन को बनाए रख सकता है।

मैक्रों के पास ‘कोहैबिटेशन’ का विकल्प भी है। इस स्थिति में, वह सोशलिस्ट पार्टी के नेता ओलिवियर फॉर को प्रधानमंत्री बना सकते हैं। हालांकि, ऐसी स्थिति में भी सरकार को बहुमत के लिए दक्षिणपंथी दलों के समर्थन की आवश्यकता होगी। विश्लेषकों का मानना है कि मैक्रों एक नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति करके सोशलिस्टों के साथ समझौता करने और एक कम महत्वाकांक्षी बजट पेश करने की कोशिश करेंगे। फिलहाल, मैक्रों ने तुरंत चुनाव कराने से मना कर दिया है, लेकिन अगर तीसरा प्रधानमंत्री भी जल्दी ही गिर जाता है, तो उन पर नए चुनाव कराने का भारी दबाव होगा।