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भागवत के निशाने पर क्या अमित शाह है

दिल्ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यान श्रृंखला ने कई कारणों से लोगों का ध्यान खींचा। इन व्याख्यानों का उद्देश्य संघ के दृष्टिकोण को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाना था, जिसमें राजनेता, नौकरशाह, न्यायाधीश, शिक्षाविद और विदेशी राजनयिक शामिल थे।

इस कार्यक्रम के दौरान, मंच से मोहन भागवत द्वारा की गई हर गतिविधि और हर शब्द की बारीकी से जाँच की गई। इन सभी में, सबसे अधिक चर्चा का विषय बना उनका अंग्रेजी में दिया गया भाषण। इसे कई पर्यवेक्षकों द्वारा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर एक सूक्ष्म लेकिन स्पष्ट संदेश के रूप में देखा गया, जिन्होंने हाल ही में अंग्रेजी भाषा के बारे में एक विवादास्पद बयान दिया था।

यह पूरा घटनाक्रम समझने के लिए, हमें पहले उस पृष्ठभूमि को देखना होगा जहाँ यह सब हुआ। यह व्याख्यान श्रृंखला, जो भविष्य का भारत: आरएसएस का दृष्टिकोण विषय पर आधारित थी, एक ऐसे समय में हुई जब भारत में भाषा को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कुछ राजनेता, विशेष रूप से सत्ताधारी दल से, हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में बढ़ावा देने और अंग्रेजी के वर्चस्व को कम करने के पक्ष में हैं।

इस संदर्भ में, अमित शाह का यह बयान कि भारत में अंग्रेजी बोलने वालों को जल्द ही शर्मिंदगी महसूस होगी ने एक बड़े विवाद को जन्म दिया था। इस बयान को अंग्रेजी-भाषी समुदाय के प्रति एक तरह की उपेक्षा के रूप में देखा गया, और इसने भाषाई विभाजन को और गहरा करने का काम किया।

इन परिस्थितियों के बीच, मोहन भागवत ने व्याख्यान श्रृंखला के तीसरे दिन, जब वे दर्शकों द्वारा पूछे गए सवालों के जवाब दे रहे थे, अंग्रेजी में बोलना शुरू किया। उन्होंने न केवल सवालों का जवाब दिया, बल्कि धाराप्रवाह और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखी। यह कोई आकस्मिक घटना नहीं थी; बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा थी।

आयोजकों ने पहले ही यह व्यवस्था कर रखी थी कि भागवत के हिंदी भाषण का तीन प्रमुख वैश्विक भाषाओं – अंग्रेजी, स्पेनिश और फ्रेंच – में सीधा अनुवाद किया जा सके। इसके लिए विदेशी राजनयिकों को हेडफोन दिए गए थे ताकि वे अपनी पसंद की भाषा में भाषण सुन सकें। यह व्यवस्था ही इस बात का संकेत थी कि संघ अपनी पहुँच को वैश्विक बनाना चाहता है, और इसके लिए वह अंग्रेजी को एक आवश्यक उपकरण मानता है।

जब भागवत ने खुद अंग्रेजी में बोलना शुरू किया, तो इसका महत्व और भी बढ़ गया। यह एक ऐसा दृश्य था जो अमित शाह के हालिया बयान के बिल्कुल विपरीत था। एक तरफ शाह अंग्रेजी बोलने वालों को शर्मिंदगी महसूस कराने की बात कर रहे थे, तो दूसरी तरफ भागवत गर्व और सहजता के साथ अंग्रेजी का उपयोग कर रहे थे।

उन्होंने केवल भाषा का उपयोग ही नहीं किया, बल्कि एक सवाल के जवाब में उन्होंने सीधे-सीधे भाषा विवाद पर अपना दृष्टिकोण भी रखा। उन्होंने कहा, अंग्रेजी तो बस एक भाषा है, भाषा सीखने में क्या बुराई है? यह बयान किसी भी भाषा के प्रति संघ की पारंपरिक सोच को दर्शाता है – कि कोई भी भाषा अपने आप में न तो अच्छी होती है और न ही बुरी; यह तो केवल संचार का एक माध्यम है।

महत्वपूर्ण यह है कि उस भाषा का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जाता है। भागवत का यह दृष्टिकोण अमित शाह के बयान की तुलना में कहीं अधिक उदार और व्यावहारिक था। भागवत का अंग्रेजी में बोलना सिर्फ एक भाषा का उपयोग नहीं था, बल्कि यह एक राजनीतिक और वैचारिक संदेश भी था। यह दर्शाता है कि आरएसएस, जो अक्सर अपनी रूढ़िवादी और परंपरावादी छवि के लिए जाना जाता है, अब आधुनिकता और वैश्विक पहुँच के महत्व को समझ रहा है।

संघ जानता है कि अगर उसे दुनिया के सामने अपनी बात रखनी है, तो उसे उस भाषा का उपयोग करना होगा जो वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य है। अंग्रेजी न केवल विदेशी राजनयिकों के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत के शहरी और शिक्षित वर्ग के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण भाषा है। भागवत का अंग्रेजी में बोलना इस वर्ग के प्रति भी एक तरह का सकारात्मक संकेत था। इस घटना को कई राजनीतिक विश्लेषकों ने आरएसएस और भाजपा के बीच की उस सूक्ष्म रेखा को भी उजागर करने के रूप में देखा, जो हमेशा से मौजूद रही है।

हालाँकि आरएसएस भाजपा का वैचारिक मार्गदर्शक है, लेकिन कई मुद्दों पर दोनों के बीच मतभेद होते रहते हैं। भाषा एक ऐसा ही मुद्दा है। जहाँ भाजपा के कुछ नेता हिंदी के राष्ट्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं, वहीं आरएसएस प्रमुख ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेजी को सीखने और उपयोग करने में कोई बुराई नहीं है। यह एक तरह से भाजपा के अति उत्साही नेताओं को एक नरम और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का संकेत था।