
राजलक्ष्मी सहाय
दरक दरक झर रहा हिमालय
भहर भहर कर ससर रहा
क्यों गलती दृढ़ता पाषाणों की
पत्थर माटी बन झरता जाए
प्रबल वेग से निगल रहा
हर घर मलबा बना रहा
जमींदोज मकानों में
चीखें कितनी कैद हुईं
थर थर कंपित हिमगिरि क्यों
मगर तिरंगा झंडा अपना
हरदम अटल अडिग रहना
क्यों क्षीण शक्ति बादल की
भार न सहता खुद के जल का
घट फूटे बारम्बार घटा का
जल की जगह बरसती मौत
क्यों बादल बेबस लाचार
क्या सचमुच बदरी नीर भरी
क्या दुख जो आंसू बहा रही
बहा ले गए झटके में
विलीन हो गया जन जीवन
पर तुम न हो बेचैन तिरंगा
सदा अटल अडिग रहना
क्या देवदार हैं बीमार
क्यों हुआ खोखला अमिट तरु
थाम न सकता माटी क्यों
क्या प्राण शक्ति हो रही क्षीण
क्यों दरक दरक पर्वत बहता
क्या चूक हुई मानवता से
मानवता मिटती ही जाती
पर अमर तिरंगा डटा रहे तू
जब तक सूरज चांद रहे
क्यों सरिता बौखलाई
क्यों तोड़ किनारा उद्वेलित
कच्चे बिचड़े ही फांक रही
कृषक विवश लाचार खड़े
भूख भूख की रट सुनकर
लहराना भूल न जाना तुम
होना न विकल तुम राष्ट्र ध्वज
हे अटल तिरंगा लहराना
अग्नि लपट ने ढांप दिया
गुम हुआ अंगारों में विमान
देह बने कोयला वीभत्स
अंगारे की तपन अभी भी
अंतरिक्ष में भटक रही
तुझको भी क्या धाह लगी
क्या आह आह मुख से निकली
हर कदम रखा अंगारों पर
है नया घाव हर सीने पर
पर एक झलक तेरी पाकर
शीतल हो जाते जख्म सभी
तुमपर न आंच लगे कोई
तेरी छवि सुंदर बनी रहे
रहना तुम अडिग अमर झंडा
तुमको बुना शहीदों ने
धागे रंगे रक्त से अपने
कोई ताकत न सके तोड़
धागों से वज्र पराजित
कटी लौह जंजीर
ऐसी हस्ती इन धागों की
अपनी हस्ती को रख संभाल
यह अमर तिरंगा अटल रहे
सरहद के वीर सपूतों की
तुम्ही दृष्टि तुम्हीं शक्ति
तुम्ही ताप तुम्हीं ठंडक
वेग रक्त का गति कदमों की
मातृभूमि का वंदन तुम
उनके माथे का चंदन तुम
दुशाला तुम कफन भी तुम
तुम जीवन मुक्ति भी तुम
इसीलिए हे अमर तिरंगे
सदा अडिग अटल रहना
मानव खेल रहा सृष्टि से
सब रंगों को बदरंग किया
पंचतत्व को जहर किया
न्योत रहा महाप्रलय
महानाश भी गर आए
रहे न कुछ भी शेष
पर हे अमर तिरंगे मेरे
हो आसीन प्रलय लहर पर
अटल अमिट दृढ़ तुम रहना