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पुरातत्व से हस्तकला तक हुआ है मुखौटों का सफर

  • सुमन कुमार सिंह

रांची: कहा गया है-हर चेहरे पे मुखौटा है, हकीकत कोई नहीं जानता। यह कविता का तंज भले हो, पर सच यह है कि मानव ने हजारों वर्ष पहले से मुखौटे बनाए और पहने। पुरातत्व में पत्थर, हड्डी, लकड़ी के लगभग 9,000 वर्ष पुराने मुखौटे मिले हैं, जिनका उपयोग आत्माओं, पूर्वजों या जानवरों की शक्ति धारण करने, शिकार और युद्ध में भ्रम पैदा करने या भय दिखाने के लिए होता था।

इन दिनों पटना के बिहार म्यूजियम में बिहार म्यूजियम बिनाले-2025 जारी है, जिसका विषय है ग्लोबल साउथ: साझा इतिहास । इसमें एक विशेष प्रदर्शनी आध्यात्मिक दिव्य मुखौटे, अनुष्ठानिक सामग्री और रंगमंचीय यात्रा शीर्षक से आयोजित है, जिसमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ओशिनिया की जीवंत मुखौटा परंपराओं को प्रदर्शित किया गया है। इन क्षेत्रों में मुखौटे धार्मिक-सांस्कृतिक अनुष्ठानों, सामुदायिक स्मृति और पहचान के प्रतीक हैं, और अक्सर स्थानीय हस्तकला, प्राकृतिक रंगों व पारंपरिक सामग्री से बनाए जाते हैं।

प्रदर्शनी में सबसे प्राचीन भारतीय उदाहरण है चिरांद (बिहार) का टेराकोटा मुखौटा (1-2 शताब्दी ई.), जो संभवत: रक्षात्मक या अलौकिक अनुष्ठानों में प्रयुक्त होता था। यह नवपाषाण-ताम्रयुगीन परंपरा का महत्वपूर्ण साक्ष्य है।

असम का सत्रिया मुखौटा भी यहाँ प्रदर्शित है, जो माजुली के सत्रों में वैष्णव नाट्यरूप ह्यमुखा-भाओनाह्णमें प्रयुक्त होता है। बाँस, कपड़े, मिट्टी और प्राकृतिक रंगों से बना यह हल्का मुखौटा पौराणिक पात्रों को जीवंत करता है और धार्मिक-सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा है। अफ्रीका से आए नाइजीरिया के योरूबा समुदाय के एपा हेलमेट मुखौटे पूर्वजों और नायकों का स्मरण कराते हैं। इन पर मूर्तिकला द्वारा पुरोहित, शिकारी, किसान, राजा आदि के चित्र अंकित रहते हैं और उत्सव के बाद इन्हें पवित्र स्थलों पर सुरक्षित रखा जाता है।

पश्चिम अफ्रीका के सींग वाले मुखौटे (इग्बो या बामाना) मानव-सदृश चेहरों और पशु सींगों का मिश्रण हैं, जो आध्यात्मिक संपर्क, दीक्षा संस्कार और सुरक्षा से जुड़े हैं। लकड़ी, धातु, हाथीदाँत या मिट्टी से बने ये मुखौटे समारोह और पूर्वज-पूजन में प्रयुक्त होते हैं।

भारत के हिमालयी क्षेत्र और तिब्बत में छम नृत्य मुखौटे बौद्ध मठों में धार्मिक कथाओं के मंचन और दुष्ट शक्तियों को दूर करने हेतु पहने जाते हैं। इन्हें पवित्र वस्तु मानकर अनुष्ठान के बाद मठों में सुरक्षित रखा जाता है।

इन विविध परंपराओं में शैली, सामग्री और धार्मिक संदर्भ भिन्न हैं, पर सभी का साझा उद्देश्य अदृश्य को दृश्य बनाना, सामुदायिक स्मृति को जीवित रखना और समाज को आध्यात्मिक शक्ति से जोड़ना है। यदि आप निकट भविष्य में पटना जाएँ, तो इस प्रदर्शनी में जाकर विश्व भर के इन जीवंत मुखौटों की कहानी अवश्य देखें -यह केवल कला नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मकथा है।