मेरी भी असफलताएं हैं, माफी मांगने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं – भारत में आखिरी बार कब किसी निर्वाचित सरकार के मुखिया, किसी जनप्रतिनिधि को सार्वजनिक रूप से इस भाषा में बोलते देखा गया था? पहलगाम आतंकवादी हमले के बाद जम्मू-कश्मीर विधानसभा के विशेष सत्र में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा बोले गए शब्द न केवल असाधारण थे, बल्कि उनके बोलने का तरीका भी दुर्लभ और असाधारण था।
हालांकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि पहलगाम की घटना ने जो सुरक्षा खामी उजागर की है, उसकी जिम्मेदारी उमर सरकार पर नहीं है – कश्मीर में सुरक्षा मुद्दों से उनका कोई सीधा संबंध नहीं है। केंद्र शासित प्रदेश कश्मीर में तैनात सेना केंद्रीय रक्षा मंत्रालय के अधीन है, जबकि अर्धसैनिक बल केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन हैं; पुलिस व्यवस्था भी लेफ्टिनेंट गवर्नर के नियंत्रण में है।
उन सबकी उपस्थिति में (वास्तविक अनुपस्थिति में) बैसरन में एक भयानक घटना घटी। मुख्यमंत्री ने कहा कि पर्यटन मंत्री होने के नाते कश्मीर आने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उनकी जिम्मेदारी थी, लेकिन वह इस कार्य में विफल रहे और इसके लिए वह माफी मांगते हैं।
भारतीय राजनीति में, विशेषकर हाल के दिनों में, माफी की यह भाषा और शैली बहुत दुर्लभ हो गई है। इसलिए इस पर अधिक चर्चा की जरूरत है। राजनीति में माफ़ी का विशेष महत्व है और कभी-कभी प्रत्यक्ष रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है, लेकिन लगभग हर मामले में यह तात्कालिक डैमेज कंट्रोल या नेताओं और मंत्रियों तथा उनकी पार्टियों द्वारा दूरगामी राजनीतिक हितों की प्राप्ति के लिए एक उपकरण मात्र होता है – जो हमेशा स्थिति पर निर्भर करता है।
जन प्रतिनिधियों को कभी भी नागरिकों के सामने आकर यह कहते नहीं सुना जाता कि, मैंने गलती की; जैसे ही वे विभिन्न बहानों और बहानों के साथ यह कह पाते हैं कि, गलती हो गई, उनका काम और जिम्मेदारी पूरी हो जाती है। इन दिनों भारत में प्रचलित राजनीतिक विमर्श का प्रमुख – और वस्तुतः एकमात्र – स्वर विषाक्त पुरुषत्व का है; माफी मांगने जैसा कार्य पुरुषत्व के उस मानक के विरुद्ध है।
इस स्थिति में, जब कुछ ऐसा हो रहा है जिससे न केवल नागरिकों के हितों को बल्कि उनके जीवन को भी नुकसान पहुंच रहा है, ये राज्य के नेता सर्वदलीय बैठक की चारदीवारी के बाहर जनता के सामने आकर यह नहीं कह पा रहे हैं कि कहीं न कहीं बहुत बड़ी गलती हुई है, हम विफल रहे हैं, नागरिक कृपया हमें माफ करें।
इसी बात पर फिल्म अंकुश का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था अभिलाष ने और संगीत में ढाला था कुलदीप सिंह ने। इसे पुष्पा पागधरे ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
इतनी शक्ति हमें दे न दाता
मनका विश्वास कमज़ोर हो ना
हम चलें नेक रास्ते पे हमसे
भूलकर भी कोई भूल हो ना…
हर तरफ़ ज़ुल्म है बेबसी है
सहमा-सहमा-सा हर आदमी है
पाप का बोझ बढ़ता ही जाये
जाने कैसे ये धरती थमी है
बोझ ममता का तू ये उठा ले
तेरी रचना क ये अन्त हो ना…
हम चले…
दूर अज्ञान के हो अन्धेरे
तू हमें ज्ञान की रौशनी दे
हर बुराई से बचके रहें हम
जितनी भी दे, भली ज़िन्दगी दे
बैर हो ना किसीका किसीसे
भावना मन में बदले की हो ना…
हम चले…
हम न सोचें हमें क्या मिला है
हम ये सोचें किया क्या है अर्पण
फूल खुशियों के बाटें सभी को
सबका जीवन ही बन जाये मधुबन
अपनी करुणा को जब तू बहा दे
करदे पावन हर इक मन का कोना…
हम चले…
हम अन्धेरे में हैं रौशनी दे,
खो ना दे खुद को ही दुश्मनी से,
हम सज़ा पाये अपने किये की,
मौत भी हो तो सह ले खुशी से,
कल जो गुज़रा है फिरसे ना गुज़रे,
आनेवाला वो कल ऐसा हो ना…
हम चले नेक रास्ते पे हमसे,
भुलकर भी कोई भूल हो ना…
इतनी शक्ति हमें दे ना दाता,
मनका विश्वास कमज़ोर हो ना…
अब झारखंड में लौटते हैं तो मुख्यमंत्री वनाम नेता प्रतिपक्ष के घमासान के केंद्र में राज्य के डीजीपी अनुराग गुप्ता है। भाजपा खेमा यह दावा करता है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस अफसर को हटाने को कहा है। इसी मुद्दे पर भाजपा नेता और राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी लगातार हमलावर है।
अजीब संयोग है कि भाजपा के रघुवर दास के शासन काल में बाबूलाल मरांडी ने ही विपक्ष में रहते हुए अनुराग गुप्ता पर हार्स ट्रेडिंग में शामिल होने का आरोप लगाया था। कभी भाजपा के करीबी होने वाले अनुराग गुप्ता अचानक से अब हेमंत सोरेन के करीबी नजर आने लगे हैं। विरोध में मरांडी तब भी थे और अब भी हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि तब वह भाजपा में नहीं थे और अब भाजपा में है।