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बरखा का मौसम जी को जलाके .. .. …

बरखा का मौसम कुछ अच्छा नहीं चल रहा है। जमीनी हकीकत पर बात करें को पहाड़ी इलाकों में इस मौसम ने कहर ढा दिया है। पहाड़ों पर लगातार हो रहे भूस्खलन और जान माल के नुकसान के बाद हम फिर से यह कहने लगे हैं कि हमलोगों ने खुद ही अपनी लालच में यह आफत मोल ली है। जहां तहां मकान और पहाड़ धंस रहे हैं। देश की कई सुंदर और महत्वपूर्ण सड़के भी इस बारिश की भेंट चढ़ गयी है। दूसरी तरफ कई खेती वाले इलाके ऐसे हैं, जहां पानी की कमी से धान की खेती सही ढंग से नहीं हो पायी है। कुल मिलाकर केस पूरा गड़बड़ हो गया है।

असली मौसम से अलग अब पॉलिटिकल मौसम की बात करें तो बारिश और ठंड की किसी को अभी चिंता नहीं है। सभी की नजर आने वाले चुनावों पर टिकी है क्योंकि विधानसभा चुनाव में अगर फायदा नहीं मिला तो तय है कि लोकसभा चुनाव की गाड़ी गति नहीं पकड़ पायेगी। उसके ऊपर से अब गाहे बगाहे वैसे चुनावी बम भी फटने लगे हैं, जिसने कभी डॉ मनमोहन सिंह की सरकार के पतन की कहानी लिखी थी।

जी हां मैं जारी होने वाले सीएजी रिपोर्टों की बात कर रहा हूं। अकेले नीतीन गडकरी है, जिन्होंने चर्चा होने के बाद सार्वजनिक तौर पर अपनी तरफ से इस पर सफाई दी है और बताने की कोशिश की है कि दरअसल लागत इतनी अधिक क्यों हुई। वरना दूसरे मंत्रालयों के मामले में तो सारे मंत्री चुप्पी साधे बैठे हैं।

अकेली स्मृति ईरानी हैं जो दिल्ली से अमेठी तक राहुल गांधी को कोसने के बाद अब उस मीडिया से भी नाराज होने लगी हैं, जो कभी उनके चमचे हुआ करते थे। वैसे बरखा के मौसम में असली कंफ्यूजन तो महाराष्ट्र को लेकर है, कौन सा पवार किधर है और चुनाव के वक्त किस तरफ रहेगा, यह कोई समझ ही नहीं पा रहा है। एनडीए और इंडिया के मोर्चाबंदी के बीच यह मसला इंपोर्टेंट हो गया है क्योंकि महाराष्ट्र का चुनाव परिणाम और वहां की राजनीति पूरे देश पर असर डालती है।

मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में फिलहाल तो सीधा मुकाबला है। एमपी गजब है में आम आदमी पार्टी ने टंगड़ी फंसाकर दोनों दलों को परेशान कर दिया है। ऊपर से सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सेवा विधेयक के खिलाफ दायर याचिका को स्वीकार कर यह साफ कर दिया है कि उप राज्यपाल के जरिए शासन करने की चाल का रास्ता मोदी सरकार के लिए इतना आसान भी नहीं है।

वैसे लगता है कि पहली बार भाजपा का ऐसे लोगों से पाला पड़ गया है जो बहुत सीमित संख्य़ा में होने के बाद भी केंद्र सरकार के नाक में दम किये हुए हैं। नाराज भाजपा अब पंजाब में भी राष्ट्रपति शासन लगाने की बात कहने लगी है। कुल मिलाकर बारिश ने गर्मी बढ़ा दी है। इसी बात पर फिल्म सलाखें का यह गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा और सुरों में ढाला था रविंद्र जैन ने और उसे अपना स्वर दिया था आशा भोंसले ने। गीत को बोल कुछ इस तरह हैं।

बरखा का मौसम जी को जलाके चला जाये
बरखा का मौसम जी को जलाके चला जाये
हाय रे ये पानी लगन लगा के चला जाये
जी को जलाके चला जाये

बरखा का मौसम जी को जलाके चला जाये
कभी कभी खोया हुआ मिल भी जाये
जाये जोश में फिर मुड़ के न आये
कभी कभी खोया हुआ मिल भी जाये
जाये जोश में फिर मुड़ के न आये
धरती से नभ तक अँधेरा ही अँधेरा
जाने कब सूरज लायेगा सवेरा
साजन सलोना ऐसा न हो कही
गोरी तक लाके चला जाये
जी को जलाके चला जाये
बरखा का मौसम जी को जलाके चला जाये
हाय रे ये पानी लगन लगा के चला जाये
जी को जलाके चला जाये
बरखा का मौसम जी को जलाके चला जाये।

अब ईडी की भी बात करें जिसने छत्तीसगढ़ और झारखंड में बड़ी कार्रवाई की है। यह पहला मौका है कि अब ईडी की छापामारियों को भी चुनौती दी जाने लगी है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सार्वजनिक तौर पर छापामारी में क्या कुछ हुआ, उसका खुलासा कर दिया। दूसरी तरफ बंगाल में ईडी रेड में कंपनी के कंप्यूटर में बाहर की फाइल डाले जाने की शिकायत पुलिस में दर्ज हो गयी।

अब ईडी निदेशक आगामी 15 सिंतबर तक क्या गुल खिलायेंगे, इस पर सभी की नजर है पर यह भी तय है कि अब मुकाबला एकतरफा नहीं रहा है। लोग ईडी की छापामारी और जांच के भय से उबरते हुए जवाबी हमला करने लगे हैं। झारखंड की बात करें तो एक तरफ केंद्र सरकार ईडी भेज रही है तो हेमंत सरकार भाजपा के पूर्व मंत्रियों की संपत्ति की निगरानी जांच करा रही है। यानी तुम डाल डाल तो मैं पात पात। चुनाव तक शह मात का खेल चलेगा लेकिन बाजी किसके हाथ लगेगी, यह कहना कठिन है।