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स्थानीय कांग्रेसियों के बूते की बात नहीं एक सीट

सामान्य बातचीत से अब नहीं मानेगी झारखंड मुक्ति मोर्चा

  • नीतीश के हाल ने दिमाग बदल दिया

  • असम और बंगाल से उपजी है नाराजगी

  • भाजपा के अंदर अपनी उठापटक का दौर

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड की दो राज्यसभा सीटों पर होने वाले आगामी द्विवार्षिक चुनाव को लेकर राज्य का सियासी तापमान चरम पर पहुंच गया है। अंदर के हालात बाहर की गरमी जैसे ही हैं। सत्ताधारी गठबंधन के भीतर और विपक्षी खेमे में शह-मात का खेल शुरू हो चुका है। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और विधानसभा में संख्या बल को देखते हुए झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) इस बार बेहद आक्रामक रणनीति अपना रहा है। जेएमएम इस ताक में है कि वह अपने और सहयोगियों के अतिरिक्त वोटों के गणित के बूते राज्यसभा में एक नहीं, बल्कि दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार जिताकर संसद भेजे।

दूसरी तरफ, गठबंधन की सहयोगी कांग्रेस पार्टी भी हार मानने को तैयार नहीं है और चुनावी मैदान में अपनी दावेदारी ठोक रही है। कांग्रेसी खेमे की ओर से पूर्व सांसद धीरज साहू और वरिष्ठ नेता सुबोध कांत सहाय के नामों को रेस में आगे बढ़ाया जा रहा है। हालांकि, मौजूदा विधायकों की संख्या और हालिया राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए कांग्रेस के लिए सीट हासिल करना एक टेढ़ी खीर साबित हो रहा है।

हाल ही में संपन्न हुए पश्चिम बंगाल और असम के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के अड़ियल रवैये और गठबंधन विरोधी रुख से झारखंड मुक्ति मोर्चा का शीर्ष नेतृत्व बेहद नाराज बताया जा रहा है। झामुमो के अंदरखाने यह चर्चा आम है कि जब कांग्रेस दूसरे राज्यों में क्षेत्रीय दलों को तवज्जो नहीं देती, तो झारखंड में जेएमएम अपनी थाली से सीट निकालकर कांग्रेस को क्यों दे? जेएमएम के रणनीतिकारों का स्पष्ट मानना है कि राज्यसभा सीट पर कोई भी समझौता तभी संभव है जब कांग्रेस का शीर्ष केंद्रीय नेतृत्व सीधे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से बात करे, प्रांतीय नेताओं की पैरवी यहां काम नहीं आएगी।

गठबंधन के इस आंतरिक मतभेद और खींचतान की वजह से प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी के खेमे में उम्मीद की एक नई किरण जगी थी। भाजपा रणनीतिकारों को लग रहा था कि कांग्रेस से तल्खी का फायदा उठाकर झामुमो को अपने पाले में लाया जा सकता है या फिर राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग की जमीन तैयार की जा सकती है। परंतु, बिहार के हालिया घटनाक्रमों और वहां नीतीश कुमार की राजनीतिक स्थिति को नजदीक से देखने के बाद, झामुमो का नेतृत्व बेहद सतर्क हो गया है। जेएमएम के बड़े नेताओं का साफ कहना है कि वे भाजपा के इस सियासी फंदे में दोबारा पैर रखने को कतई तैयार नहीं हैं। पार्टी पूरी तरह से एकजुट है और विपक्षी एजेंडे को नाकाम करने के लिए कमर कस चुकी है।

झामुमो की सूची में कई संभावित नामों पर चर्चाओं का दौर जारी है, लेकिन अंतिम और ठोस फैसला अभी तक नहीं हो सका है। राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर भारी सस्पेंस है कि इन दो सीटों पर सोरेन परिवार के ही किसी सदस्य को मौका मिलेगा या फिर वर्षों से पार्टी के लिए खून-पसीना बहाने वाले किसी वफादार और जमीनी सिपाही को संसद भेजा जाएगा। उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दो-तीन दिनों के भीतर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने कोर ग्रुप के साथ मैराथन बैठक कर नामों पर अंतिम मुहर लगा देंगे।

इसी बीच, भाजपा के अंदर भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। तय नियमावली के मुताबिक प्रदेश भाजपा इकाई ने केंद्रीय चुनाव समिति को तीन संभावित नामों का पैनल भेज दिया है, जिस पर अंतिम निर्णय केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और जेपी नड्डा को लेना है। लेकिन इसी दौरान उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सांसद परिमल नाथवाणी के नाम की चर्चा अचानक तेज होने की वजह से भाजपा के स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस तथा बेचैनी की स्थिति पैदा हो गई है। अब देखना दिलचस्प होगा कि इस सियासी बिसात पर ऊंट किस करवट बैठता है।