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ईडी निदेशक का समाप्त होता कार्यकाल

सुप्रीम कोर्ट ने व्यापक जनहित वाली सरकारी दलील के बाद प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के निदेशक एसके मिश्रा का कार्यकाल 15 सितंबर तक बढ़ा दिया। 11 जुलाई के फैसले के अनुसार मिश्रा का कार्यकाल 31 जुलाई को समाप्त होना था, जिसमें अधिकारी को दिए गए पिछले एक्सटेंशन को अवैध माना गया था।

न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संजय करोल की पीठ ने केंद्र की याचिका को आंशिक रूप से अनुमति दे दी। इसके पहले ही शीर्ष अदालत उनके सेवाविस्तार को गलत करार दिया थ। इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिर से इसे पंद्रह सितंबर तक बढ़ाने के अनुरोध को स्वीकार करने के बाद से ही यह दो सवाल खड़े हो गये हैं कि नये निदेशक के तौर पर मोदी सरकार इस पद पर किसे लाना चाहती है और क्या बार बार सेवाविस्तार पाने वाले ईडी निदेशक के पास सरकार की कोई गोपनीय अतिरिक्त जिम्मेदारी भी है।

यदि सर्वोच्च न्यायालय को सरकार की इच्छाओं को अत्यधिक टालने के रूप में देखा जाता है तो यह कोई आश्चर्य या आश्चर्य की बात नहीं है। केंद्र के अनुरोध पर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के प्रमुख संजय कुमार मिश्रा को 15 सितंबर तक पद पर बने रहने की अनुमति देने वाला आदेश अनावश्यक रूप से उदार है। 11 जुलाई को ही न्यायालय ने श्री मिश्रा को 2021 और 2022 में दिए गए विस्तार को अवैध घोषित कर दिया था।

साथ ही, सुचारु परिवर्तन सुनिश्चित करने के लिए उन्हें 31 जुलाई तक जारी रखने की अनुमति दी गई थी। फिर भी, बिना यह बताए कि उनके उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया शुरू हो गई है, न्यायालय ने उन्हें 15 सितंबर तक पद पर बने रहने की अनुमति देने के लिए एक अपरिभाषित व्यापक राष्ट्रीय हित का आह्वान किया है।

यह पहले में एक स्वयं-सेवा आवेदन था जगह। सरकार को उनकी सेवाओं को अपरिहार्य लगने का स्पष्ट कारण यह है कि वह वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (एफएटीएफ) के समक्ष देश की समीक्षा के दौरान मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण का मुकाबला करने के लिए अपने ढांचे को प्रदर्शित करने के देश के प्रयासों का नेतृत्व कर रहे हैं। बहुपक्षीय निकाय एक पारस्परिक मूल्यांकन प्रणाली अपनाता है और भारत की चल रही समीक्षा जून 2024 तक चलेगी, जब अंतिम मूल्यांकन रिपोर्ट पर इसके अनुपालन स्थिति पर संभावित पूर्ण चर्चा पर विचार किया जा सकता है।

सरकार ने उनकी सेवाओं को 15 अक्टूबर तक बढ़ाने की मांग की, शायद इसलिए क्योंकि तब तक देश की एजेंसियां और संस्थान एफएटीएफ प्रतिनिधिमंडल के दौरे के लिए तैयार हो सकते हैं। मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ कानून का संचालन करने वाली एजेंसी के रूप में, देश की प्रस्तुति तैयार करने में ईडी की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है, लेकिन यह विश्वास करना मुश्किल है कि यह प्रक्रिया एक व्यक्ति पर निर्भर करती है।

यदि ऐसा था भी, तो सरकार को श्री मिश्रा की सेवाओं का उपयोग अकेले एफएटीएफ उद्देश्यों के लिए करने से नहीं रोका गया, जबकि निदेशालय की नियमित गतिविधियों को उनके उत्तराधिकारी के अधीन छोड़ दिया गया। किसी भी स्थिति में, विभिन्न एजेंसियां और प्राधिकरण मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद के वित्तपोषण पर देश की नीतियां तैयार करने में शामिल हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायालय ने उन तर्कों को नहीं माना जो इन बिंदुओं पर प्रकाश डालते थे। इससे सवाल उठे कि एक व्यक्ति कैसे अपरिहार्य हो सकता है, लेकिन अंततः उसे कुछ और समय तक पद पर बने रहने की अनुमति देने का फैसला किया गया।

कोई भी इस तर्क को समझ सकता है कि देश की छवि सकारात्मक एफएटीएफ मूल्यांकन पर निर्भर करती है, लेकिन यह दावा कि श्री मिश्रा को विस्तार नहीं देने से नकारात्मक छवि बन सकती है, काफी समझ से परे है। भारत की साख का मूल्यांकन उसके कानूनों, प्रणालियों और वैश्विक मानकों के अनुपालन पर किया जाएगा, न कि इस बात पर कि रिपोर्ट किसने तैयार की।

न्यायालय की अनुमति उन कार्यों के लिए सरकार को जवाबदेह ठहराने के उसके संकल्प से विमुख हो जाती है जिन्हें उसने स्वयं अवैध घोषित कर दिया था। लोकसभा चुनाव के करीब आने के बीच बदलते राजनीतिक समीकरणों से भी कई चीजें बदलती नजर आ रही हैं। अचानक से सीएजी की रिपोर्टों में कई सरकारी योजनाओँ में वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा होना भी कोई शुभ संकेत नहीं है।

आंख का ईलाज कराने विदेश गये टीएमसी नेता अभिषेक बनर्जी के बयान के बाद झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की बात भी यह संकेत दे रही है कि अब सभी नये ईडी निदेशक की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे में चुनावी खेमाबंदी का भी इस पर असर पड़ेगा अथवा नहीं, यह देखने वाली बात होगी। ऐसा संदेह इसलिए भी उपज रहा है क्योंकि सीएजी द्वारा मोदी सरकार की कई गड़बड़ियों की सूचना यूं ही इस मौके पर बाहर नहीं आयी होगी। टू जी और थ्री जी घोटाला भी चुनावी मुद्दा बना था जो कांग्रेस की सरकार के परास्त होने का कारण बना।