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दोतरफा हमला और अंदर का घमासान भाजपा की परेशानी

भारतीय जनता पार्टी स्पष्ट तौर पर दूसरे तमाम दलों से बहुत आगे दिख रही है। यह कर्नाटक के विधानसभा चुनाव की स्थिति नहीं है। यह अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव का परिदृश्य है जो अभी नजर आ रहा है। दरअसल 37 प्रतिशत वोट पाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाले भारतीय जनता पार्टी के सामने अब तक कोई सम्मिलित चुनौती नहीं बनी है।

जिस तरीके से विपक्ष में बयानबाजी हो रही है, उससे तो लगता है कि यह काम फिलवक्त आसान नहीं है। इसलिए माना जा सकता है कि भाजपा खुले तौर पर बढ़त की स्थित में है। इसके बाद भी भाजपा और जनता के बीच जो सवाल उपज गये हैं, वे भी इतने आसान अब नहीं रहे। दरअसल हिंडनबर्ग रिपोर्ट में अडाणी का मुद्दा सामने आने के बाद जिस तरीके से भाजपा इस सवाल से भाग रही है, वह जनता के मन में संदेह पैदा करता है।

अब विदेशी शेल कंपनियों से अडाणी की कंपनियों में बीस हजार करोड़ का निवेश नया सवाल बनकर खड़ा हो गया है। यूं तो अडाणी ने इस मुद्दे पर सफाई दी है। अडाणी समूह ने सोमवार को नई सफाई पेश की है। समूह ने अब पिछले चार साल का पूरा हिसाब सार्वजनिक किया है। साथ ही अडाणी समूह ने यह भी कहा है कि उसे बर्बाद करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है।

समूह ने बताया है कि साल 2019 से अब तक उसे अपनी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने से 2.87 मिलियन डॉलर मिले हैं और इनमें से 2.55 बिलियन डॉलर को विभिन्न व्यवसायों में लगाया जा चुका है। अबु धाबी स्थित इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी पीजेएससी ने अडाणी समूह की अडाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड और अडाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड जैसी कंपनियों में 2.593 बिलियन डॉलर का निवेश किया है, जबकि प्रवर्तकों ने 2.783 बिलियन डॉलर जुटाने के लिए अडाणी टोटल गैस लिमिटेड और अडाणी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड की हिस्सेदारी बेची है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी आरोप लगाया है कि अडाणी समूह को शेल कंपनियों से 20 हजार करोड़ रुपये मिले हैं। संसद में जेपीसी से मामले की जांच का मुद्दा आगे नहीं बढ़ गया और अब सुप्रीम कोर्ट इन मामलों की सुनवाई कर रहा है। इसलिए यह प्रकरण भाजपा और खासकर भाजपा का चुनाव प्रचार अपने बलबूते पर खींच ले जाने वाले नरेंद्र मोदी की छवि पर धक्का है।

लोकसभा में राहुल गांधी ने स्पष्ट तौर पर जो सवाल उठाये थे और लोकसभा की कार्यवाही से जिन वाक्यों को हटा दिया गया, वे भी जनता के मन में अविश्वास पैदा करने के लिए पर्याप्त हैं। यह पहली चुनौती है जो बाहर से भाजपा को मिल रही है। दूसरी चुनौती नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता का है। दरअसल यह मुद्दा उस तरीके का नहीं है, जैसा भाजपा वाले बता रहे हैं।

अगर नरेंद्र मोदी पढ़े लिखे नहीं भी हैं तो मतदाताओं को इससे कोई परहेज नहीं है। लेकिन अगर उनके चुनावी हलफनामा में डिग्रियों का उल्लेख है तो उस बारे में सवाल उठना लाजिमी है क्योंकि इस विषय पर खुद श्री मोदी ने अलग अलग समय में अलग अलग बातें कही है। जनता को सच्चाई पर पर्दा डालने से आपत्ति होती है, यह भी भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण विषय है।

इसी वजह से बोफोर्स तोप सौदे और बाद में टू जी और थ्री जी के साथ साथ कोयला घोटाले में कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार चली गयी थी। अब सबसे नई राष्ट्रीय पार्टी बनी आप ने इसे अलग से मुद्दा बना दिया है क्योंकि गुजरात हाई कोर्ट ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर पच्चीस हजार रुपये का जुर्माना कर मधुमक्खी के छत्ते में पत्थर फेंकने का काम किया है।

नतीजा यह हुआ है कि आम आदमी पार्टी ने डिग्री प्रकरण को अपना प्रचार अभियान बना दिया है। यह तो रही बाहरी चुनौतियों की बात। अब अंदर की बात करें तो कर्नाटक के प्रत्याशियों की सूची जारी करने से ही स्पष्ट हो गया है कि लगातार सत्ता में रहने की जितनी बीमारियां कांग्रेस को लगी थी, उनमें से अधिकांश अब भाजपा में भी घर कर चुकी है।

लोग अपना राजनीतिक भविष्य खत्म होते देख संगठन की चिंता छोड़ अपनी चिंता में लगे हैं। इसी वजह से लगातार आपसी मतभेद बढ़ रहे हैं। पार्टी का पूरा नियंत्रण नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास होने की वजह से इन्हें इसी शीर्ष को चुनौती दिया जाना माना जा सकता है। दरअसल यह कोई सहज स्थिति नहीं है।

आने वाले दिनों में अन्य राज्यों में भी चुनाव होने वाले हैं। वहां भी अगर इस किस्म की गुटबाजी उभरकर सामने आयी तो लोकसभा चुनाव के आते आते परिस्थितियां बहुत बिगड़ चुकी होंगी। खतरा इस बात का भी है कि अगर इस बीच अडाणी प्रकरण और डिग्री मामले में कुछ और नया मोदी के खिलाफ आ गया तो छवि को जो नुकसान पहुंचेगा, उसकी भरपाई करने वाला भाजपा में फिलहाल कोई दूसरा नेता नहीं है।