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भारत ने वाणिज्य सचिव के बयान का खंडन किया

ट्रंप के सहयोगी लुटनिक के बयान पर तुरंत प्रतिक्रिया आया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः अमेरिकी वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक के उस विवादास्पद बयान ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, जिसमें उन्होंने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के विफल होने का ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ा है। लुटनिक ने एक पॉडकास्ट में दावा किया कि पिछले साल दोनों देशों के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौता लगभग तैयार था, लेकिन वह केवल इसलिए अंतिम रूप नहीं ले सका क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया। उन्होंने इसे चूक गया अवसर बताते हुए कहा कि भारत को समझौते के लिए तीन शुक्रवार की समय सीमा दी गई थी, जिसे दिल्ली ने गंवा दिया।

भारत के विदेश मंत्रालय ने इन दावों को पूरी तरह से गलत और भ्रामक बताते हुए खारिज कर दिया है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अपने साप्ताहिक ब्रीफिंग में स्पष्ट किया कि व्यापार वार्ताओं का जो चित्रण अमेरिकी पक्ष से किया गया है, वह हकीकत से परे है।

भारत ने जोर देकर कहा कि दोनों देश एक संतुलित और पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौते के लिए प्रतिबद्ध हैं, और इसके लिए लगातार कई दौर की बातचीत हुई है। जायसवाल ने लुटनिक के फोन कॉल न करने वाले व्यक्तिगत कटाक्ष का जवाब देते हुए कहा कि 2025 के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच आठ बार टेलीफोन पर बातचीत हुई है, जिसमें द्विपक्षीय संबंधों के हर महत्वपूर्ण पहलू पर चर्चा की गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापार समझौते में असली बाधा फोन कॉल नहीं, बल्कि ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाए गए भारी टैरिफ थे। पिछले साल अगस्त में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के मुद्दे पर नाराजगी जताते हुए भारत पर कुल 50 फीसद तक का दंडात्मक टैरिफ लगा दिया था। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, अमेरिका भारत के कृषि और डेयरी क्षेत्रों को अपने बाजार के लिए खोलने का दबाव बना रहा था, जो भारत के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है।

लुटनिक ने यह भी दावा किया कि भारत के देरी करने की वजह से अमेरिका ने इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों के साथ पहले समझौते कर लिए। हालांकि, नई दिल्ली ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी दबाव में आकर देश के आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगी। इस ताजा विवाद ने संकेत दिया है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक संबंध इस समय पिछले दो दशकों के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं।