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केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग पर सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट बुधवार को कांग्रेस की अगुवाई में 14 पार्टियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करेगा, जिसमें विपक्षी नेताओं के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों के मनमाने इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है और भविष्य के लिए दिशानिर्देश मांगे गए हैं।

शीर्ष अदालत की वेबसाइट पर अपलोड व्यवसायों की सूची के अनुसार, विपक्षी दलों की याचिका पर 5 अप्रैल को भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सुनवाई की जाएगी। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और जे बी पारदीवाला भी पीठ का हिस्सा हैं।

वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी द्वारा 24 मार्च को तत्काल सुनवाई के लिए संयुक्त याचिका का उल्लेख किया गया था। जिसमें कहा गया है कि वे सभी भविष्य के लिए दिशानिर्देश मांग रहे हैं। यह सीबीआई और ईडी दोनों एजेंसियों के दुरुपयोग के खिलाफ 14 दलों का एक उल्लेखनीय शिकायत है।

वरिष्ठ वकील ने 2014 में एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद सीबीआई और ईडी द्वारा दायर मामलों की संख्या में वृद्धि का उल्लेख किया। दूसरे आंकड़े, 2014 से पहले और 2014 के बाद: मामलों में भारी उछाल आया है। सजा की दर चार से पांच प्रतिशत है। हम पूर्व-गिरफ्तारी दिशानिर्देश और गिरफ्तारी के बाद की जमानत के दिशा-निर्देश मांग रहे हैं।

याचिका में आरोप लगाया गया है कि विपक्षी राजनीतिक नेताओं और असहमति के अपने मौलिक अधिकार का प्रयोग करने वाले अन्य नागरिकों के खिलाफ जबरदस्ती आपराधिक प्रक्रियाओं के उपयोग में खतरनाक वृद्धि हुई है। एक याचिकाकर्ता की ओर से जारी एक बयान में आरोप लगाया गया है, राजनीतिक असंतोष को पूरी तरह से कुचलने और प्रतिनिधि लोकतंत्र के मौलिक परिसर को खत्म करने के उद्देश्य से सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों को एक चुनिंदा और लक्षित तरीके से तैनात किया जा रहा है।

उन्होंने वकील शादान फरासत के माध्यम से दायर याचिका में कुछ आंकड़ों का हवाला दिया और कहा कि उन्होंने “चौंकाने वाली और असंवैधानिक स्थिति” का प्रदर्शन किया। कांग्रेस के अलावा, जो दल संयुक्त कदम का हिस्सा हैं, वे हैं डीएमके, आरजेडी, बीआरएस, तृणमूल कांग्रेस, आप, एनसीपी, शिवसेना (उद्धव गुट) जेएमएम, जेडीयू, भाकपा और माकपा के अलावा समाजवादी पार्टी , और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस।

हाल के दिनों में तेजी से बदलती भारतीय राजनीति में राहुल गांधी के खिलाफ आया फैसला और लोकसभा सचिवालय द्वारा की गयी त्वरित कार्रवाई ने भी इस याचिका पर सभी का ध्यान केंद्रित कर दिया है। इसके पहले भी कई अवसरों पर सुप्रीम कोर्ट का नजरिया केंद्र सरकार से भिन्न होने की पुष्टि हो चुकी है। पेगासूस के मामले में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला दिया था लेकिन शीर्ष अदालत ने निजता के संवैधानिक अधिकार की बात कही और उसके द्वारा गठित जांच कमेटी में पेगासूस के इस्तेमाल की प्रारंभिक पुष्टि हो गयी है।

उसके बाद स्वायत्त संवैधानिक संस्थाओँ के शीर्ष पदों पर नियुक्ति का सवाल भी शीर्ष अदालत के समक्ष आया और अदालत की प्रारंभिक टिप्पणी केंद्र सरकार की दलीलों से मेल नहीं खाती नजर आयी। ईडी के निदेशक का कार्यकाल बढ़ाये जाने के मुद्दे पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से सवाल पूछा है।

इस कड़ी में दिल्ली के उप राज्यपाल को नोटिस जारी किया जाना भी एक उदाहरण है जो यह बताता है कि केंद्र सरकार जैसा चाहती है, वैसा ही आचरण सुप्रीम कोर्ट नहीं कर रहा है। दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली नगर निगम में दस पार्षदों के मनोनयन पर राज्य सरकार की सिफारिशों पर ध्यान दिये बिना ही कार्रवाई की।

यह शीर्ष अदालत की ध्यान में लाया गया है। इसलिए अब केंद्रीय एजेंसियों का राजनीतिक मकसद से दुरुपयोग का मामला चर्चा में है। इसके बीच ही ममता बनर्जी ने प्रतीकात्मक तौर पर अपने धरना मंच से भाजपा वाशिंग मशीन का प्रदर्शन कर स्थिति साफ कर दी है। इसमें उन्होंने वाशिंग मशीन में काला कपड़ा डालकर सफेद कपड़ा निकालने का प्रदर्शन किया था।

ऐसे में केंद्रीय एजेंसियों के अलावा भी कई घटनाक्रम ऐसे हैं, जो याचिका के समर्थन में नजर आते हैं। मसलन झारखंड, बिहार के कुछ घोटालों की राज्य पुलिस की जांच प्रारंभ होते ही उनमें केंद्रीय एजेंसियों का दखल, तेलंगना में विधायकों की खरीद के मामले में केंद्रीय एजेंसी का दखल और अब साइबराबाद में करब सत्तर करोड़ लोगों का डेटा चोरी का जांच प्रारंभ होते ही ईडी का हस्तक्षेप विरोधियों के आरोपों की पुष्टि करता है।

ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में इन मुद्दों पर अपनी तरफ से क्या राय देती है। दरअसल केंद्र सरकार की एक परेशानी यह भी है कि केंद्रीय कानून मंत्री किरेण रिजिजू लगातार सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम पर तो पहले से ही बयानबाजी कर रहे थे। अब हाल में उन्होंने कुछ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को भी राष्ट्र विरोधी बताकर बड़ी परेशानी मोल ली है। यह सभी बयान सुप्रीम कोर्ट में बैठे लोगों को पसंद आ रहे होंगे, इसका उम्मीद बेमानी है।