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कोरोना के दौरान बनाये गये अस्थायी आवास अब वीरान पड़े हैं

  • इन क्वारेंटीन शिविरो में सबसे बड़ा पेनीज बे

  • शहर आवास के लिहाज से काफी महंगा है

  • खाली पड़े हुए आवासों का भविष्य क्या

हॉंगकॉंगः कोरोना महामारी के दौरान लोगों को क्वारेंटीन रखने के लिए बनाये गये आवास का क्या होगा, यह अब एक बड़ा सवाल बन गया है। वैसे सभी जानते हैं कि रहने के लिहाज से हॉंगकॉंग एक महंगा शहर है। यहां औसत घर दस लाख डॉलर के उत्तर में बिकता है। एक पार्किंग की जगह भी दस लाख के करीब जा सकती है।

वैसे यहां गरीब भी रहते हैं लेकिन उनका घर दरअसल घर नहीं एक पिंजरा जैसा आवास है। अब सरकार पर इस बात का दबाव है कि कोरोना महामारी के दौरान लोगों के एकांतवास के लिए जो आवास बनाये गये थे, उनका क्या किया जाए।

सैकड़ों हजारो लोगों को अलग करने के लिए महामारी के दौरान बनाए गए क्वारेंटीन केंद्रों के आवास अभी खाली पड़े हुए हैं। इसलिए सवाल उठ गया है कि इन आवासों का आगे क्या किया जाए। हांगकांग के अधिकारियों ने जनता को यह नहीं बताया है कि क्वारेंटीन केंद्रों को बनाने की लागत कितनी है।

अनेक स्थानीय बुद्धिजीवियों का तर्क है कि भूमि राजस्व पर सरकार की कथित निर्भरता आवास को एक संरचनात्मक समस्या में बदलने का जोखिम है जिसे सार्थक रूप से हल नहीं किया जा सकता है।

इन  शिविरों में से केवल तीन का वास्तव में उपयोग किया गया है; शेष पांच को स्टैंड-बाय पर रखा गया क्योंकि टीकाकरण की दर में वृद्धि हुई और संक्रमण संख्या में कमी आई।

शिविरों में सबसे बड़ा पेनीज बे है, जो हांगकांग के डिज़नीलैंड के बगल में एक साइट है, जहाँ 1 मार्च को समाप्त हुए 958 दिनों के ऑपरेशन के दौरान लगभग 10,000 इकाइयों में 270,000 से अधिक लोग रुके थे।

लगभग 200 वर्ग फुट मापने वाली, प्रत्येक इकाई मोटे तौर पर कार पार्किंग की जगह के आकार की होती है और इसमें एक साधारण शौचालय, शॉवर और बिस्तर होता है। कुछ में ही रसोई है।

पेनीज़ बे में कुछ इकाइयों का उपयोग माध्यमिक विद्यालय के छात्रों के लिए एक विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा आयोजित करने के लिए किया गया था जो संक्रमित मामलों के निकट संपर्क थे; एक अन्य समय में, शिविर ने एक छोटे से चुनाव मतदान केंद्र की मेजबानी की। अब हर स्तर पर बनाये गये इन संरचनाओँ का क्या हो, यह सवाल सरकार को परेशान कर रहा है।