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अडाणी प्रकरण से देश के खुदरा निवेशक हतोत्साहित

देश के शेयर बाजार में अब खुदरा निवेशक कम जा रहे हैं। दरअसल इस मुद्दे पर अधिकांश लोगों को राहुल गांधी के उस बयान ने प्रभावित किया है, जिसमें उन्होंने पूर्व आरबीआई गर्वनर रघुराम राजन के साथ बात करते हुए अडाणी की कंपनियों में निवेश करने वाले संसद के एक कर्मचारी का उल्लेख किया था।

खुदरा निवेशकों का यह भय गलत भी नहीं है। इससे पहले भी देश हर्षद मेहता और केतन पारीख कांड देख चुका है। इसी वजह से अब बढ़ती ब्याज दरों और कमजोर शेयर बाजार ने शायद खुदरा निवेशकों के व्यवहार को प्रभावित किया है। व्यक्तिगत स्तर पर निवेशक शेयर बाजार के समक्ष सीधे जोखिम से बच रहे हैं।

आंकड़ों से यह संकेत भी मिलता है कि कुछ निवेशकों ने निवेश को इक्विटी के बजाय तयशुदा आय वाली योजनाओं में डाला है जबकि अन्य ने डेरिवेटिव क्षेत्र को चुना है। दूसरी तरफ विदेशी निवेश बढ़ रहा है क्योंकि वहां विश्वसनीयता का ऐसा संकट नहीं आया है।

नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2023 में व्यक्तिगत निवेशकों की भागीदारी कई वर्षों के निचले स्तर पर रही तथा एनएसई के कई सक्रिय कारोबारियों की संख्या भी लगातार आठवें महीने कम हुई। साल 2022 के दौरान भारतीयों ने विदेशी प्रतिभूतियों, संपत्ति और जमा पत्रों संभवत: रिकॉर्ड निवेश किया है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में किसी 12 महीने की अवधि में भारतीयों द्वारा विदेशी शेयरों व संपत्तियों में किया गया सर्वाधिक निवेश 2.1 अरब डॉलर था। यह प्रत्येक व्यक्तिगत श्रेणी में खर्च के लिहाज से भी सर्वाधिक रकम है। विदेशी जमा पत्रों, संपत्तियों, शेयरों एवं अन्य निवेश भी दिसंबर 2022 में समाप्त 12 महीने की अवधि में नई ऊंचाई को छू गया।

सरकार ने उदारीकृत योजना के तहत भारतीयों को विदेश में विभिन्न उद्देश्यों के लिए 2,50,000 डॉलर खर्च करने की अनुमति दी है। इसमें उपरोक्त निवेश कि अलावा शिक्षा, चिकित्सा, उपहार, दान, यात्रा और करीबी रिश्तेदारों या अन्य उद्देश्यों पर किया गया खर्च भी शामिल हो सकता है।

निवेश संबंधी आंकड़े अप्रैल 2011 के बाद से उपलब्ध हैं। इस प्रकार 12 महीने की पहली अवधि मार्च 2012 से है। साल 2011 से पहले के कुछ उपलब्ध आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि विदेशी जमा, संपत्ति अथवा प्रतिभूति/डेट में 12 महीने का कुल निवेश कभी भी 35 करोड़ डॉलर से अधिक नहीं रहा था।

दिसंबर 2022 में समाप्त 12 महीने की अवधि में विदेशी जमा, संपत्ति अथवा प्रतिभूति/डेट में निवेश 96.95 करोड़ डॉलर की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। दिसंबर के लिए मासिक आंकड़ा भी 11.95 करोड़ डॉलर पर सर्वाधिक रहा। इससे पता चलता है कि विदेशी शेयरों में भारतीय निवेशकों की दिलचस्पी काफी बढ़ गई है।

बड़ी तादाद में ब्रोकरेज ने अपने ग्राहकों को गूगल की मूल कंपनी अल्फाबेट, प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनी माइक्रोसॉफ्ट और ऑनलाइन रिटेलर एमेजॉन जैसी कंपनियों के शेयरों में निवेश को बरकरार रखने में मदद की।

भारतीय निवेशकों ने एलआरएस निवेश के अलावा म्युचुअल फंडों के जरिये भी इन कंपनियों में निवेश किया है। नियामकीय प्रतिबंधों ने म्युचुअल फंडों की विदेशी प्रतिभूतियों में अधिक जोखिम लेने की क्षमता को प्रभावित किया है। इसके अलावा विदेश से एक निश्चित राशि से अधिक के प्रेषण के लिए स्रोत पर 20 फीसदी कराधान से विदेश में निवेश की रफ्तार सुस्त पड़ सकती है।

विदेशी निवेश का कुल मूल्य 98.57 करोड़ डॉलर है और इसमें से अधिकांश निवेश मार्च और अप्रैल में हुआ। प्रतिभूति के वृद्धिशील निवेश में लगातार तेजी नहीं दिखी है क्योंकि दिसंबर 2022 तक 12 महीनों का आंकड़ा रिकॉर्ड ऊंचाई पर है। अचल संपत्ति में निवेश दिसंबर 2021 के बाद 12 महीने की अवधि में 10 करोड़ डॉलर के पार पहुंच गया।

15.76 करोड़ डॉलर का ताजा आंकड़ा भी रिकॉर्ड स्तर पर है। इधर भारतीय शेयर बाजार पर गौर करें तो यह पता चलता है कि भारतीय बाजार के कई शेयरों की मांग कम है। यह खुदरा निवेशकों की घटती रुचि का मजबूत संकेत है। हालांकि निफ्टी 50 पिछले 12 महीनों में 3.5 फीसदी ऊपर गया है लेकिन निफ्टी स्मॉल कैप 100 सूचकांक इसी अवधि में 10 फीसदी गिरा है।

एनएसई का अनुमान है कि उच्च आय वाले व्यक्तियों सहित व्यक्तिगत स्तर पर निवेशकों ने जनवरी में 22,829 करोड़ रुपये का निवेश किया जो मार्च 2020 के बाद न्यूनतम मासिक निवेश है। साथ ही यह फरवरी 2021 के 58,409 करोड़ रुपये के रिकॉर्ड निवेश से भी काफी कम है।

नकद बाजार के कुल निवेश में खुदरा निवेशकों की हिस्सेदारी 66 फीसदी के उच्चतम स्तर की तुलना में 44 फीसदी रह गई। जनवरी में एनएसई के सक्रिय खातों की संख्या 3.4 करोड़ रही जो दिसंबर 2022 की तुलना में तीन फीसदी कम थी। यह उनकी संख्या में गिरावट का लगातार आठवां महीना था। जून 2022 में ये खाते 3.8 करोड़ के साथ उच्चतम स्तर पर थे। आईपीओ गतिविधियों में गिरावट खुदरा निवेशकों की घटती भागीदारी का एक और संकेत है।