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तुर्की और सीरिया का भूकंप भारत के लिए भी एक सबक है

तुर्की और सीरिया के भूकंप में अब तक 41 हजार से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। 6 फरवरी की सुबह से पहले दक्षिणी तुर्की शहर गजियांटेप के पास 7.8 की तीव्रता वाले भूकंप ने दोनों देशों के शहरों को बर्बाद कर दिया, जिससे लाखों लोग घायल हो गए और कई बचे लोग कड़ाके की ठंड में बेघर हो गए।

तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन ने स्वीकार किया कि भूकंप के बाद शुरुआती प्रतिक्रिया के दौरान कुछ समस्याएं थीं, लेकिन उन्होंने दावा किया कि स्थिति अब नियंत्रण में है। राजधानी अंकारा से राष्ट्र के नाम एक संबोधन में, एर्दोगन ने कहा, हम न केवल अपने देश, बल्कि मानव जाति के इतिहास की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदाओं में से एक से निपट रहे हैं।

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सीरिया में मरने वालों की संख्या 5,814 है। भूकंप के एक सप्ताह से अधिक समय बाद मंगलवार को बचावकर्मियों ने तुर्की में इमारतों के मलबे से नौ लोगों को जिंदा निकाला। उनमें से 17 और 21 साल के दो भाइयों को कहारनमारस प्रांत में एक अपार्टमेंट ब्लॉक के मलबे से बचाया गया था।

दो सौ से अधिक घंटों के बाद, एक सीरियाई पुरुष और एक युवती को हटे प्रांत की राजधानी अंताक्या के खंडहरों से बचाया गया। एक बचावकर्मी ने टिप्पणी की कि बचाए जाने के लिए अभी भी और लोग जीवित फंसे हो सकते हैं। लेकिन संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों का कहना है कि बचाव का चरण समाप्त हो रहा है, अब ध्यान जीवित बचे लोगों के लिए आश्रय, भोजन और स्कूल प्रदान करने पर केंद्रित है।

कई बेघर लोग थोड़े से आश्रय और भोजन की तलाश में कड़कड़ाती ठंड में खुले आसमान के नीचे भाग रहे हैं। वे अब राहत प्रयासों का लक्ष्य हैं। लोगों को काफी परेशानी हो रही है। हमने एक तंबू और अन्य सहायता के लिए आवेदन किया, लेकिन अभी तक हमें कुछ भी नहीं मिला है।

सीरियाई शरणार्थी हसन सिमा ने कहा कि वह और उसका परिवार तुर्की के गजियांटेप में एक खेल के मैदान में शरण लिए हुए हैं। सिमा और अन्य सीरियाई शरणार्थी देश के युद्ध से भाग गए और गाज़ियांटेप में शरण ली, लेकिन भूकंप ने उन्हें भी बेघर कर दिया।

उन्होंने उस खेल के मैदान में प्लास्टिक शीट, बॉक्स कार्टन आदि के साथ एक अस्थायी आश्रय बनाया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन यूरोपीय क्षेत्र के निदेशक हैंस हेनरी पी के मुताबिक मांग बहुत बड़ी है, घंटे के हिसाब से बढ़ रही है। दोनों देशों में करीब 26 लाख लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत है।

यह एक बढ़ती चिंता है क्योंकि ठंड के मौसम, स्वच्छता और कचरा निपटान और संचारी रोगों के प्रसार से संबंधित विभिन्न स्वास्थ्य मुद्दे उत्पन्न होते हैं। कमजोर लोग विशेष रूप से जोखिम में हैं। इस प्राकृतिक आपदा के बीच से जो आक्रोश उभर रहा है वह भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

वहां के लोग इतनी सारी इमारतों के भरभराकर गिर जाने की वजह घटिया निर्माण को निर्माण संबंधी कानूनों का उल्लंघन मानते हैं। यह भारत के लिए भी समय से पहले उपाय करने की पूर्व चेतावनी है। देश के लगभग हर हिस्से में चांदी के सिक्कों की खनखनाहट ने सरकारी मुलाजिमों को कानून का पालन करने से अलग किया है।

इमारत बनाने के नियमों का उल्लंघन होने के बाद भी इन इमारतों को सिर्फ पैसे से नियमित करने की प्रक्रिया अब एक आम बात है। इसकी वकालत करने वालों से यह पूछा जाना चाहिए कि इससे इंसानी जीवन पर जो खतरा बढ़ रहा है, उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।

जिन लोगों पर नियमों के अनुकूल भवन निर्माण की देखरेख की जिम्मेदारी है, वे भी अपनी यह जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभा रहे हैं। यद्यपि गोंडवाना प्लेट के हिस्सों पर स्थित भारतीय इलाको में ऐसा खतरा कम होने की आशंका है।

फिर भी तुर्की और सीरिया की तबाही यह सोचने पर मजबूर करती है कि यदि गोंडवाना प्लेट के ऊपर स्थित इलाकों में भी भूकंप आया तो तुर्की और सीरिया जैसी तबाही यहां होगी अथवा नहीं होगी। नियमों की अनदेखी कर बनाये गये भवन ऐसे झटकों को कितना झेल पायेंगे, यह बच्चा भी समझ सकता है।

दूसरी परेशानी तुर्की और सीरिया की वर्तमान सामाजिक स्थिति की है। ट्विटर पर हमें सीरियाई नहीं चाहिए, शरणार्थियों को वापस भेजो, अब और स्वागत नहीं जैसे सीरिया विरोधी नारे देखे जा सकते हैं। भूकंप प्रभावित शहर गजियांटेप लगभग 500,000 सीरियाई शरणार्थियों का घर है, जो शहर की कुल आबादी का लगभग एक चौथाई है।

गज़ियांटेप उन सीरियाई शहरों में से एक है जो भूकंप से बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए हैं। सीरियाई लोगों के प्रति तुर्की का गुस्सा कोई नया नहीं है, लेकिन भूकंप के बाद की स्थिति ने इन तनावों को बढ़ा दिया है। यह भी भारत के लिए खतरे की एक पूर्व चेतावनी ही है।