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गुजरात और दिल्ली दोनों के वोटरों के एक जैसे तेवर

कम मतदान से पूर्व के अनुमान गलत साबित होने लगते हैं, यह पूर्व विदित तथ्य है। गुजरात के पहले चरण में कुछ ऐसा ही हुआ है जिस कारण हर दल को स्पष्ट तौर पर यह बात समझ में नहीं आ रहा है कि यह नुकसान उसे हुआ है या उसके विरोधी को। किस पक्ष के मतदाताओं ने मतदान केंद्रों तक जाने की जहमत नहीं उठायी, यह तुरंत में समझ पाना कठिन है।

गुजरात के पहले चरण के मतदान के बाद अब दिल्ली में भी वही हाल हुआ है, जहां औसतन पचास प्रतिशत मतदान की सूचना है। यानी यह माना जा सकता है कि चुनाव आयोग के साथ ही राजनीतिक दलों के तमाम प्रयासों के बावजूद दिल्ली नगर निगम चुनाव को लेकर मतदाताओं में न तो किसी तरह का उत्साह दिखाई दिया और न ही कोई लहर नजर आई। नतीजतन शाम साढ़े पांच बजे तक सिर्फ 50 प्रतिशत ही मतदान हो सका, जो 2012 और 2017 से भी कम रहा है। हालांकि, जो मतदाता साढ़े पांच बजे शाम तक मतदान केंद्रों में प्रवेश कर गए थे, उनसे मतदान कराया गया।

रात साढ़े आठ बजे तक कई मतदान केंद्रों पर यह प्रक्रिया चली। ऐसे में भाजपा और आम आदमी पार्टी  के बीच कड़ा संघर्ष माना जा रहा है। मतदान के दौरान छिटपुट राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में छिटपुट नोकझोंक और दक्षिणी दिल्ली के मदनगीर में रुपये बांटे जाने की अफवाह जरूरी उड़ी, लेकिन कहीं से भी मारपीट झगड़े की शिकायत देर रात तक नहीं मिली। न ही चुनाव आयोग को ईवीएम में किसी तकनीकी समस्या की शिकायत मिली।रविवार सुबह आठ बजे मतदान की प्रक्रिया शुरू हुई, जो दोपहर बाद तक सुस्त ही रही। इसलिए दिन में दो बजे तक सिर्फ 30 प्रतिशत ही मतदान हो सका।

दो बजे के बाद मतदान में जरूर कुछ तेजी नजर आई। इससे अगले दो घंटों में यानी चार बजे तक मतदान बढ़कर 45 प्रतिशत हो गया और इसके बाद शाम साढ़े पांच बजे तक यह आंकड़ा 50 प्रतिशत तक पहुंच गया। यह पिछले दो नगर निगम चुनावों की तुलना में कम रहा। रविवार को शादी का मुहूर्त अधिक होने के कारण बड़ी संख्या में शादियां थीं, जिनके लिए बहुत से लोग या तो दिल्ली से बाहर चले गए थे या दिल्ली में ही शादियों की तैयारियों में जुटे हुए थे। ऐसा माना जा रहा है कि इसकी वजह से भी मतदान का प्रतिशत कम रहा।

दिल्ली में मतदाताओं की संख्या 1,45,05, 358 है। इसमें 7893418 पुरुष मतदाता, जबकि 66,10,879 महिला मतदाता हैं। अन्य श्रेणी में आने वाले मतदाताओं की संख्या 1061 है। 95458 मतदाता पहली बार मतदान में हिस्सा लेने वाले थे। वहीं, 100 वर्ष से अधिक आयु के मतदाताओं की संख्या 229 है। जबकि 80 से 100 वर्ष की आयु के बीच के मतदाताओं की संख्या 2.04 लाख के करीब है। इसलिए दोनों ही प्रमुख दावेदार दलों के लिए यह तय कर पाना कठिन हो गया है कि मतदान केंद्रों तक उसके समर्थक मतदाता अधिक पहुंचे या उसके विरोधियों के वोटर गये। कुछ ऐसा ही गुजरात के पहले चरण के चुनाव में भी हो चुका है,

जहां किसी भी दल को यह बात समझ में नहीं आ रही है कि किसके वोटरों ने वोट नहीं डाले हैं। दिल्ली के नगर निगम का चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां सरकार आम आदमी पार्टी की है लेकिन सरकार पर कब्जा केंद्र सरकार का है। पहले यहां भाजपा नगर निगम पर काबिज थी और तीनों निगमों को एक करने का केंद्र सरकार का फैसला आया था। वैसे चुनाव के ठीक पहले यह फैसला आलोचनाओं का शिकार भी हुआ था।

आम आदमी पार्टी ने स्थानीय मुद्दों पर चुनाव मैदान में मुकाबला किया जबकि भाजपा ने राष्ट्रीय मुद्दों पर। इनसे अलग कांग्रेस तो इस लड़ाई में खुलकर उतर भी नहीं पायी और उसकी तरफ से कोई बढ़चढ़कर दावा भी नहीं किया गया। दिल्ली नगर निगम का चुनाव राजनीतिक तौर पर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके अपने बजट का आकार कोई छोटा नहीं होता। इसलिए भाजपा ने यहां पर अपना कब्जा कायम रखने की पुरजोर कोशिश की है।

अब गुजरात के दूसरे चरण का मतदान जारी होने के दौरान ही इन दोनों ही हो चुके चुनावों के साथ साथ हिमाचल प्रदेश के ईवीएम में कैद किस्मत की चर्चा भी होने लगी है। इन ईवीएमों के अंदर क्या है, इसका अंदाजा लगाना कठिन है क्योंकि मतदान के प्रतिशत के आधार पर जो आकलन किये जा सकते थे, वे नहीं हो पा रहे हैं। लेकिन इतना स्पष्ट है कि चुनाव जीते अथवा ना जीते आम आदमी पार्टी अब राष्ट्रीय पार्टी बनने जा रही है क्योंकि चुनाव परिणाम प्रतिकूल होने के बाद भी वह गुजरात से छह प्रतिशत वोट हासिल कर ही लेगी। तीन राज्यों में उसे यह पहले ही मिल चुका है।