भरोसे का बार बार कत्ल आखिर क्यों
भारत की परीक्षा प्रणाली आज एक ऐसे गंभीर संकट का सामना कर रही है जो केवल मार्कशीट, उत्तर पुस्तिकाओं या सॉफ्टवेयर की तकनीकी गड़बड़ियों तक सीमित नहीं है। वर्तमान में देश की प्रमुख राष्ट्रीय परीक्षाओं में जो स्थिति उभर कर सामने आ रही है, वह वास्तव में उस क्षण में संस्थागत विश्वसनीयता का एक गहरा पतन है, जब मध्यम वर्गीय आकांक्षाओं और सामाजिक गतिशीलता के लिए शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा पूरी तरह केंद्र बिंदु बन चुकी है।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं के डिजिटल मूल्यांकन से उपजा हालिया विवाद पहली नजर में भले ही एक तकनीकी समस्या लग सकता है। नया ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम लागू होने के बाद छात्रों ने उत्तर पुस्तिकाओं के आपस में बदल जाने, गलत अपलोडिंग, पन्ने गायब होने और मूल्यांकन के अनियमित पैटर्न के गंभीर आरोप लगाए हैं।
इसके साथ ही, साइबर सुरक्षा से जुड़ी कमियों के दावों ने यह बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या छात्रों के संवेदनशील शैक्षणिक डेटा को पर्याप्त रूप से सुरक्षित रखा गया था या नहीं। प्रशासनिक अधिकारी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि सुरक्षात्मक उपाय मौजूद हैं और शिकायतों की समीक्षा की जा रही है।
लेकिन इस विफलता से होने वाला नुकसान व्यक्तिगत त्रुटियों से कहीं अधिक इस बढ़ती सार्वजनिक धारणा में छिपा है कि अब इस व्यवस्था पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यह धारणा इसलिए भी अधिक राजनीतिक और भावनात्मक रूप से तीखी हो गई है क्योंकि यह राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा के विवाद के ठीक बाद सामने आई है।
भारत की सबसे महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षाओं में से एक, नीट में कथित पेपर लीक के मामले ने पहले ही देश भर में सार्वजनिक आक्रोश, अदालती मुकदमों और छात्रों व अभिभावकों के बीच व्यापक बेचैनी पैदा कर दी थी। अब इसके बाद सीयूइटी की परीक्षा की बात सामने आयी है। ये सभी घटनाएं मिलकर एक ऐसे परीक्षा तंत्र की तस्वीर पेश करती हैं जो अत्यधिक दबाव में है—एक ऐसा तंत्र जो तकनीकी रूप से तो महत्वाकांक्षी है, लेकिन प्रशासनिक रूप से अपनी सीमाओं से अधिक खिंच चुका है और लगातार विफलताओं के प्रति संवेदनशील होता जा रहा है।
करोड़ों भारतीय परिवारों के लिए परीक्षाएं कोई नियमित या सामान्य मूल्यांकन मात्र नहीं हैं। ये जीवन को परिभाषित करने वाले वे निर्णायक फिल्टर हैं जो उच्च शिक्षा, नौकरियों, छात्रवृत्तियों और समाज में प्रतिष्ठा तक पहुंच तय करते हैं। एक ऐसे देश में जहां आर्थिक प्रगति और गतिशीलता आज भी असमान है और अवसर बेहद सीमित हैं, वहां परीक्षाओं की निष्पक्षता में जनता का विश्वास उतना ही महत्वपूर्ण है जितनी कि खुद परीक्षाएं।
एक बार जब यह विश्वास कमजोर हो जाता है, तो हर परीक्षा परिणाम संदिग्ध लगने लगता है और हर प्रक्रियात्मक त्रुटि एक विस्फोटक मुद्दा बन जाती है। भारतीय शिक्षा नौकरशाही लंबे समय से अपनी सक्षमता के प्रमाण के रूप में केवल परीक्षाओं के विशाल आकार पर निर्भर रही है। मौजूदा समस्याओं को सुलझाने के बजाय उन्हें और अधिक विकराल बना सकता है।
डिजिटलीकरण का मतलब केवल कागज की जगह स्क्रीन ले आना नहीं है। इसके लिए एक मजबूत इंतजाम और पर्याप्त व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इन अनिवार्यताओं के बिना, तकनीक मानवीय गलतियों को दूर करने के बजाय उन्हें ‘डिजिटल अपारदर्शिता’ की आड़ में छुपा देती है। इसका सबसे बड़ा खतरा मनोवैज्ञानिक है।
अत्यधिक प्रतिस्पर्धा, कोचिंग के भारी दबाव और रोजगार की असुरक्षा से पहले से ही जूझ रही एक पूरी पीढ़ी अब इस अनिश्चितता का सामना कर रही है कि क्या उसकी कॉपियों के मूल्यांकन की प्रणाली भी भरोसेमंद है या नहीं। आत्मविश्वास का यह क्षरण स्थायी सामाजिक दुष्परिणाम पैदा कर सकता है। युवाओं की नाराजगी कॉक्रोच जनता पार्टी के तौर पर भाजपा को परेशान करने लगी है।
इंटरनेट पर विवाद भड़कने के बाद तात्कालिक रूप से आग बुझाने की कोशिश करना या चुनिंदा तरीके से डैमेज कंट्रोल करना इसका स्थायी समाधान नहीं हो सकता। भारत को परीक्षा संचालन के लिए एक अत्यंत कड़े और व्यापक प्रशासनिक ढांचे (एग्जामिनेशन गवर्नेंस फ्रेमवर्क) की आवश्यकता है। इसमें स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट, पारदर्शी समीक्षा तंत्र और जवाबदेही के ऐसे कड़े मानक शामिल होने चाहिए जो सरकारी परीक्षण एजेंसियों और निजी वेंडरों (कंपनियों) पर समान रूप से लागू हों।
परीक्षाएं हमेशा कुछ निराशा और विवाद पैदा करेंगी, क्योंकि सभी को सफलता नहीं मिल सकती। लेकिन एक जीवंत लोकतंत्र ऐसी स्थिति को कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता जहां उसके युवा नागरिक उस सीढ़ी की ईमानदारी पर ही संदेह करने लगें, जो उनकी योग्यता और प्रतिभा को पुरस्कृत करने के लिए बनाई गई है। जब परीक्षा हॉल के भीतर भरोसा टूटता है, तो उसके परिणाम केवल शिक्षा क्षेत्र तक सीमित नहीं रहते; वे सीधे तौर पर हमारी सार्वजनिक संस्थाओं की व्यापक वैधता को भी कटघरे में खड़ा कर देते हैं।