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राजभवन और सरकार के बीच चल रहा विवाद

  • राज्यपाल ने दिया था संशोधन का निर्देश

  • पूर्व राज्यपाल के कार्यकाल से जारी है विवाद

  • चुनाव आयोग की चिट्ठी के बाद से रिश्ते तल्ख

राष्ट्रीय खबर

रांची : राज्यपाल और सरकार के बीच फिर एक बार विवाद गहरा गया है। इस बार विवाद का बिषय बना है टीएसी की बैठक। वैसे टीएसी के मामले पर सरकार और राजभवन के बीच काफी पहले से ही विवाद चल रहा है। तत्कालीन राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू के वक्त से ही टीएसी को लेकर सरकार और राजभवन के बीच तेवर तल्ख है। अब फिर से मामला सामने आया है। दरअसल निकाय चुनाव को लेकर सरकार की तरफ से टीएसी की बैठक बुलायी गयी।

जिसके बाद बीते शुक्रवार राजभवन की तरफ से फिर से एक बार सरकार को चिट्ठी भेजी गयी। इससे पहले टीएसी गठन को लेकर राजभवन ने चार फरवरी 2022 को आपत्ति जतायी थी। लेकिन नौ महीने बीतने के बाद भी सरकार की तरफ से राजभवन को इस मामले में कोई जवाब नहीं भेजा गया।

और सरकार ने राजभवन की नाराजगी को नजरअंदाज करते नौ माह बाद नवंबर में बैठक भी बुला ली। इससे पहले और शुक्रवार को लिखी गयी चिट्ठी में राजभवन ने टीएसी नियमावली को असंवैधानिक बताया। इसके बावजूद टीएसी की बैठक आयोजित करने तथा इसकी सूचना राजभवन को नहीं देने को राजभवन ने गंभीरता से लिया है।

अब राज्यपाल के प्रधान सचिव नितिन मदन कुलकर्णी ने मुख्य सचिव सुखदेव सिंह के माध्यम से सरकार से पूछा है कि आखिर राजभवन की आपत्ति पर जवाब दिए बिना किस परिस्थिति में टीएसी की बैठक आयोजित की गई। उन्होंने इसे संविधान की पांचवीं अनुसूची के प्राविधानों के विरुद्ध बताया है।राज्यपाल रमेश बैस ने टीएसी के गठन संबंधित नियमावली को असंवैधानिक बताते हुए उनमें संशोधन के निर्देश झारखंड सरकार को दिए थे।

राज्य सरकार ने उसमें कोई संशोधन तो नहीं किया, पिछले दिनों इसकी बैठक भी आयोजित कर दी और उसमे कुछ प्रस्ताव पारित कर दी थी। जैसा की बताया गया है और प्रावधान है टीएसी के गठन में कम से कम दो सदस्य राजभवन से अनिवार्य होने चाहिए। राज्यपाल ने टीएसी नियमावली से संबंधित नियमावली मंगाकर उसपर कानूनी सलाह लेने के बाद राज्य सरकार को वापस लौटा दी थी।

उन्होंने गठित नियमावली को असंवैधानिक बताते हुए कहा था कि टीएसी के गठन में कम से कम दो सदस्यों का मनोनयन राजभवन से अनिवार्य रूप से होना चाहिए। वर्तमान में गठित टीएसी में ऐसा नहीं किया गया। साथ ही पांचवीं अनुसूची के तहत नियमावली पर भी उनकी स्वीकृति जरूरी थी।

राज्य सरकार ने राजभवन की आपत्ति पर कोई जवाब नहीं दिया। टीएसी के गठन का विवाद तत्कालीन राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के समय से ही चल रहा है। उन्होंने भी राजभवन से दो सदस्यों के मनोनयन नहीं होने पर सवाल उठाया था। इस बीच राज्य सरकार ने टीएसी के गठन को लेकर नई नियमावली गठित कर दी। साथ ही नई नियमावली की फाइल राजभवन की स्वीकृति के लिए नहीं भेजी गई।

नई नियमावली में अब टीएसी के गठन और सदस्यों की नियुक्ति में राजभवन का अधिकार खत्म कर दिया गया है। मुख्यमंत्री की स्वीकृति से ही सदस्यों की नियुक्ति हो रही है। राज्य सरकार का कहना है कि नयी नियमावली छत्तीसगढ़ की तर्ज पर बनाई गई है। जहां सदस्यों की नियुक्ति का अधिकार मुख्यमंत्री को है। हालांकि, राज्यपाल रमेश बैस ने टीएसी के गठन में राजभवन का अधिकार खत्म किए जाने की जानकारी तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अलावा केंद्रीय गृह मंत्रालय को दे दी थी।