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अत्यधिक हथियार होने के बाद भी यहां अपराध कम होते हैं

  • सेना की सेवा यहां अनिवार्य है

  • हर तीन में से एक हथियारबंद

  • सभी हथियार चलाने में पारंगत

बर्नः स्विटजरलैंड में दुनिया के अनेक देशों की तुलना में औसत हथियार बहुत अधिक है। इसके बाद भी यहां पिछले 21 वर्षों में सार्वजनिक स्थान पर अमेरिका के जैसी फायरिंग की घटना नहीं हुई है। अमेरिका के कोलारॉडो स्प्रिंग्स में हुई फायरिंग के बाद इस चर्चा ने जोर पकड़ा है। स्विटजरलैंड में अंतिम बार ऐसी फायरिंग 2001 में हुई थी, जिसमें एक व्यक्ति ने चौदह लोगों को मार डालने के बाद आत्महत्या कर ली थी।

आंकड़े बताते हैं कि 8.3 मिलियन की आबादी में हर तीसरे व्यक्ति के पास हथियार है। हथियारों का यहां दुरुपयोग नहीं होने के बारे में कई कारण भी गिनाये जाते हैं। पहला तो यहां हर व्यक्ति को अनिवार्य तौर पर सैनिक सेवा से गुजरना पड़ता है। इसलिए हर किसी को हथियार रखने और उसे सही तरीके से चलाने का बेहतर ज्ञान होता है। इसके अलावा वहां हथियार लेने से ही काम नहीं चलता। हथियार लेने वाले के उसके प्रशिक्षण से भी गुजरना पड़ता है।

बीस लाख से अधिक आधुनिक हथियार होने के बाद भी यहां हत्या की दर शून्य है। पिछले छह वर्षों में हथियार लेकर तनातनी की मात्र 47 घटनाएं हुई हैं। दूसरी तरफ देश में निशानेबाजी का शौक अत्यधिक है।

तेरह साल की उम्र से ही बच्चे फायरिंग सीख जाते हैं। इस क्रम में यह भी बताया जाता है कि यहां पर निशानाबाजी को एक त्योहार मानने का इतिहास काफी पुराना है। 16वीं सदी से ही इसे एक वार्षिक उत्सव के तौर पर मनाया जाता रहा है। वर्ष 1991 से अब इस प्रतियोगिता में बच्चियां भी भाग लेने लगी हैं।

इस वजह से हथियार रखने वालों की निशानेबाजी भी अच्छी होती है। शायद इसी हथियार संचालन की तकनीक की वजह से यह देश पिछले दो सौ वर्षों ने तटस्थ बने रहने में सफल रहा है। दूसरी तरफ सेना की अनिवार्य सेवा के बाद लोग अपना हथियार ही रख सकते हैं लेकिन सेना से हटने के बाद उस हथियार के लिए उसे परमिट लेना पड़ता है।

स्थानीय दुकानदारों के पास भी एक सूची होती है, जिससे पता चलता है कि किस व्यक्ति के पास कौन सा हथियार है। हाल में सशस्त्र बलों की तादाद कम करने के फैसले के बाद भी देश में पूर्ण प्रशिक्षित हथियार चलाने वालों की कोई कमी नहीं है। लेकिन जागरुकता की वजह से हथियारों का दुरुपयोग नहीं के बराबर होता है। नागरिक भी यह कहने से नहीं चूकते कि उन्होंने ऐसे हथियार सिर्फ सेना अथवा पुलिस की जिम्मेदारी फिर से संभालने के लिए ही रखा है। आंकड़े बताते हैं कि देश में जितने भी हथियार हैं उनमें से अधिकांश सेना द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले ही हैं। इसी वजह से देश में हथियार के साथ तटस्थता का नारा बुलंद होता रहता है।