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सूचना के अधिकार से केंद्र सरकार के दावे की फिर पोल खुली

  • सिर्फ छह घंटा पहले जानकारी दी थी

  • कई निदेशकों ने बेकार फैसला माना था

  • काला धन का कोई हिस्सा नहीं निकल पाया

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः नोटबंदी के मुद्दे पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि इस फैसले को लागू करने के पहले विचार विमर्श किया गया था। इस क्रम में सरकार ने यह भी कहा है कि इसके लिए भारतीय रिजर्व बैंक से भी चर्चा हुई थी। अब सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी निकलकर सामने आयी है, उससे यह दावा गलत साबित होता है।

सूचना अधिकार के कार्यकर्ता वेंकटेश नायक ने आरबीआई के निदेशक मंडल की 561 वीं बैठक की कार्यवाही की प्रति हासिल की है। इस कार्यवाही की प्रति में यह पता चलता है कि आरबीआई का निदेशक मंडल इस किस्म के किसी फैसले से अवगत नहीं था। फैसले से सिर्फ छह घंटा पूर्व उन्हें ऐसी जानकारी मिली थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश में पांच सौ और एक हजार के नोटों का प्रचलन बंद करने जा रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस बारे में दायर 58 याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सूचनाधिकार कार्यकर्ता नायक के मुताबिक आरबीआई के निदेशक मंडल के कई सदस्यों ने कहा था कि दरअसल देश का कालाधन नकदी में नहीं है। यह सोना अथवा अचल संपत्तियों में रखी हुई है। इसलिए नोटबंदी से देश को कोई फायदा नहीं होने वाला है।

यह विवाद इसलिए बना हुआ है क्योंकि नोटबंदी का एलान करते वक्त प्रधानमंत्री ने सारा काला धन वापस आने तथा आतंकवादियों की फंडिंग पर रोक लगने की बात कही थी। नोटबंदी समाप्त होने के बाद यह पता चला कि जो भी नोट बाहर थे उनका अधिकांश बैंकों में लौट चुका है और काला धन का पता नहीं चल पाया है।

दूसरी तरफ स्विस बैंक से मिली जानकारी के मुताबिक इसके बाद वहां जमा भारतीय निवेशकों को पैसा और बढ़ गया है। इस वजह से ही नोटबंदी के इस फैसले पर सवाल उठाये गये हैं। इसमें आरोप लगाया गया है कि चंद लोगों को फायदा पहुंचाने के मकसद से पूरे देश की अर्थव्यवस्था को तहत नहस करने का ऐसा गलत फैसला लिया गया था। जिस कारण बैंकों के बाहर कतारों में खड़े सैकड़ों लोग मर गये थे। आरबीआई निदेशक मंडल की बैठक में जाली नोट के बारे में भी टिप्पणी की गयी है, जिसमें यह कहा गया है कि जितनी मात्रा में जाली नोट भारतीय बाजार में हैं, वे देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित नहीं कर सकते हैं।