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मुझे नींद न आए, मुझे चैन न आए .. .. ..

मुझे नींद ना आये तो वे ज्यादा दोहरा रहे होंगे जिनके पास सत्ता है। वरना गौतम अडाणी हो या सुकेश चंद्रशेखर उन्हें क्या चिंता है। बनारस के घाट पर बैठा साधु भी मस्त है। लेकिन इस बार अगर सबसे अधिक टेंशन किसी को है तो वह मोटा भाई को यानी अमित शाह को है। उनकी परेशानियां पार्टी के अंदर अधिक है।

पश्चिम बंगाल के बाद अगर इस बार भी चुनावी रणनीति फेल हुई तो तय है कि वह पीछे चले जाएंगे और उत्तरप्रदेश के योगी आदित्यनाथ स्वाभाविक तौर पर उनसे आगे चले आयेंगे। वैसे चिंता मोदी जी को भी है क्योंकि हिमाचल प्रदेश के चुनाव का कोई खास असर पड़े या ना पड़े गुजरात के इलेक्शन का असर देश पर पड़ना तय है।

अगर गुजरात में फिर से अच्छी सीटों के साथ जीते तो कोई बात नहीं लेकिन अगर सीटें और कम हो गयीं तो टेंशन का जो सिलसिला प्रारंभ होगा, वह आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव तक और बढ़ जाएगा। अब अगले साल भी कई राज्यो में चुनाव होने वाले हैं। इसलिए गुजरात का किला बचा रहे, यह उनकी साख के लिए जरूरी है।

उनकी तथा उनके रणनीतिकारों की परेशानी दोतरफा चुनौती है। एक तरफ को पहली बार मैदान में पूरे तौर पर उतरी आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता गुजरात में बढ़ रही है। भले ही इस पार्टी को सफलता ना मिले, लेकिन यह लगभग तय हो गया है कि गुजरात से छह प्रतिशत वोट लेकर वह राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने जा रही है। यूं तो लगता है कि आम आदमी पार्टी के आने से कांग्रेस के वोटबैंक में सेंधमारी हुई है लेकिन जनता के मन मे क्या है, यह कौन जानता है। इतने वर्षों तक शासन में होने की वजह से स्वाभाविक तौर पर मैंगो मैन भाजपा से नाराज है।

दूसरी तरफ खुद केजरीवाल की परेशानी यह है कि गुजरात में चुनाव लड़ने के साथ साथ उन्हें नये ढांचे के दिल्ली नगर निगम का चुनाव भी देखना है। मोटा भाई ने केजरी को अच्छी तरह फंसा रखा है। इधर देखें कि उधर देखें। ऊपर से सुकेश चंद्रशेखर लगातार आकाशवाणी कर केजरीवाल का टेंशन बढ़ाते जा रहे हैं।

इनसे अगर राहुल गांधी पैदल चलते जा रहे हैं और अब महाराष्ट्र में वही काम कर रहे हैं। आदित्य ठाकरे के साथ पैदल चलने के पहले उन्हें एनसीपी नेताओं का भी साथ मिला है। इससे हिंदी पट्टी का माहौल बदल रहा है। गुजरात और हिमाचल के चुनाव प्रचार से अलग राहुल ने सिर्फ पैदल चलकर ही ढेर सारा प्रचार पा लिया है। अब तो मेनस्ट्रीम मीडिया को भी ना चाहते हुए भी इसे दिखाना पड़ रहा है।

इसी बात पर अमीर खान और माधुरी दीक्षित अभिनीत एक फिल्म दिल का एक गीत याद आने लगा है। इस गीत को लिखा था समीर ने और संगीत में ढाला था आनंद मिलिंद की जोड़ी ने इसे अनुराधा पौडवाल और उदित नारायण ने स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

मुझे नींद न आए, मुझे चैन न आए
कोई जाए ज़रा ढूँढ के लाए
न जाने कहाँ दिल खो गया न जाने कहाँ दिल खो गया
मुझे नींद न आए, मुझे चैन न आए
कोई जाए ज़रा ढूँढ के लाए
न जाने कहाँ दिल खो गया न जाने कहाँ दिल खो गया

हालत क्या है कैसे तुझे बताऊँ मैं
करवट बदल-बदल के रात बिताऊँ मैं
पूछो ज़रा पूछो क्या हाल है
हाल मेरा बेहाल है, हाल मेरा बेहाल है
कोई समझ न पाए क्या रोग सताए
कोई जाए ज़रा ढूँढ के लाए
न जाने कहाँ दिल खो गया न जाने कहाँ दिल खो गया

जान से भी प्यारा मुझको मेरा दिल है
उसके बिना एक पल भी जीना मुश्किल है
तौबा मेरी तौबा क्या दर्द है
दर्द बड़ा बे-दर्द है, दर्द बड़ा बे-दर्द है
कभी मुझको हँसाए, कभी मुझको रुलाए

कोई जाए ज़रा ढूँढ के लाए
न जाने कहाँ दिल खो गया न जाने कहाँ दिल खो गया।

देश से बाहर निकले तो अमेरिका में ट्रंप भइया फिर से दहाड़ रहे हैं जबकि पुतिन ने एक इलाके से सेना वापस लेकर फिर से मामले को उलझा दिया है। पता नहीं किसके दिल में क्या चल रहा है। उत्तर कोरिया का तानाशाह अपने मिसाइल दागने के खेल में व्यस्त है।

हां इस बार अपने हेमंत भइया ने जबर्दस्त दांव लगाया है। मुंह से भले ही कोई कुछ कहे, लेकिन झारखंड अलग राज्य की मांग का मूल आधार ही स्थानीयता और नियोजन था। मुख्यमंत्री पद से हेमंत ने इस उम्मीद को पूरा किया है। अब स्थानीयता नीति और नियोजन नीति की गेंद केंद्र के पाले में है। ईडी के समन के बाद भी एक साहसिक फैसला लेकर हेमंत ने झारखंड के असली वाशिंदों की दशकों से पुरानी मांग को पूरा करने का काम किया है। अब वह सीना ठोंककर यह कह सकते हैं कि उन्होंने यह साहस दिखलाया है। तो अब भाजपा को आगे यह साबित करना है कि स्थानीयता और झारखंड की नियोजन नीति को लेकर उसका क्या कहना है। यानी हेमंत सोरेन अभी आगे बढ़कर खेल रहे हैं जबकि उन्हें ईडी कार्यालय भी जाना है।