दिखावे और हकीकत के बीच फंसी भारतीय अर्थव्यवस्था
ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध ने वैश्विक राजनीति के साथ-साथ भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में देशवासियों से खर्च कम करने और सरकारी मशीनरी को फिजूलखर्ची रोकने के जो सुझाव दिए गए हैं, वे इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि आने वाले दिन आर्थिक दृष्टि से काफी कठिन होने वाले हैं।
हालांकि, इस संकट की आहट नई नहीं है। राजनीति के गलियारों से लेकर आर्थिक विशेषज्ञों के कमरों तक, इस मंदी और महंगाई की आशंका पर लंबे समय से बहस जारी थी। जब हम इस संकट के राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं का विश्लेषण करते हैं, तो विपक्ष के नेता राहुल गांधी की उस चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो उन्होंने महीनों पहले दी थी।
राहुल गांधी ने चुनावी रैलियों और प्रेस वार्ताओं में बार-बार इस बात का उल्लेख किया था कि सरकार जानबूझकर असल आर्थिक आंकड़ों को चुनावों तक दबाकर रख रही है। उनका तर्क था कि ईंधन की कीमतों में स्थिरता और बाजार का बनावटी ठहराव केवल चुनाव जीतने तक का एक छलावा है।
आज जब चुनाव संपन्न हो चुके हैं और सरकार के पास अगले कुछ वर्षों के लिए सत्ता की चाबी है, तब पेट्रोल-डीजल की कीमतों में एकाएक 3 रुपये की बढ़ोत्तरी और प्रधानमंत्री का खर्च कम करने का उपदेश विशेषज्ञों की उस राय पर मुहर लगाता है कि चुनाव निपटते ही सरकार अपने असली रंग दिखाएगी।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि ईरान युद्ध तो एक तात्कालिक कारण है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था की आंतरिक कमजोरियां और चुनावों के दौरान किए गए भारी भरकम खर्च ने खजाने पर जो दबाव बनाया है, उसकी वसूली अब जनता की जेब से शुरू हो गई है। अक्सर देखा गया है कि जब भी आर्थिक संकट आता है, सरकारें मध्यम वर्ग को त्याग का पाठ पढ़ाने लगती हैं। विज्ञापन, भव्य सरकारी आयोजन, मंत्रियों के विदेश दौरे और राजनीतिक रैलियों पर होने वाला बेतहाशा खर्च कम होता नहीं दिखता, लेकिन सब्सिडी और जनकल्याणकारी योजनाओं की कैंची सबसे पहले चलती है।
यदि सरकार सच में मितव्ययिता चाहती है, तो इसकी शुरुआत शीर्ष स्तर से होनी चाहिए। क्या सरकार अपने प्रचार-प्रसार के बजट में कटौती करेगी? क्या नौकरशाही के तामझाम और लग्जरी सुविधाओं पर रोक लगेगी? यदि ऐसा होता है, तभी जनता के बीच मितव्ययिता का संदेश एक सार्थक अपील बनेगा, अन्यथा यह केवल एक राजनीतिक प्रदर्शन बनकर रह जाएगा।
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80 प्रतिशत से अधिक आयात करता है। ईरान-इजरायल युद्ध ने कच्चे तेल की कीमतों को 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया है। इसका सीधा असर भारत के चालू खाता घाटे पर पड़ता है। जब तेल महंगा होता है, तो माल ढुलाई महंगी होती है, जिससे सुई से लेकर सब्जी तक हर चीज के दाम बढ़ जाते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी का सुझाव इसी संदर्भ में है कि ऊर्जा की खपत कम की जाए। लेकिन क्या भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी लचीली है कि वह अचानक अपनी खपत कम कर दे? औद्योगिक उत्पादन और परिवहन के लिए तेल एक अनिवार्य ईंधन है। ऐसे में केवल जनता को खर्च कम करने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है; सरकार को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों और रणनीतिक तेल भंडार के इस्तेमाल पर एक ठोस नीति स्पष्ट करनी होगी।
भारत में अक्सर देखा गया है कि संकट के समय सरकारी विभाग खर्च में कटौती का एक सर्कुलर जारी करते हैं। कुछ दिनों तक एसी कम चलाने, चाय-नाश्ते के खर्च कम करने या कागजों का दोनों तरफ इस्तेमाल करने जैसे प्रतीकात्मक कदम उठाए जाते हैं। लेकिन जैसे ही संकट टलता है, स्थिति फिर पहले जैसी हो जाती है। देश को आज प्रतीकात्मक मितव्ययिता की नहीं, बल्कि संरचनात्मक मितव्ययिता की आवश्यकता है।
ईरान युद्ध ने भारत के सामने एक बड़ा आर्थिक ब्लैकहोल खड़ा कर दिया है। प्रधानमंत्री का सुझाव सही दिशा में है, बशर्ते वह केवल एक राजनीतिक जुमला न हो। यदि सरकार वास्तव में देश हित चाहती है, तो उसे अपनी असली रंग दिखाने वाली छवि को बदलकर एक जिम्मेदार अभिभावक की छवि अपनानी होगी।
गैर-उत्पादक खर्चों में कटौती की शुरुआत प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद से होनी चाहिए ताकि आम आदमी को यह विश्वास हो सके कि वह अकेला इस बोझ को नहीं उठा रहा है। ऐसा तब होकर जब उसे सरकार में ऊपर से नीचे तक यह नजर आयेगा। देशहित तभी सधेगा जब मितव्ययिता का प्रदर्शन सड़कों पर कम और सरकारी फाइलों तथा नीतियों में ज्यादा दिखे। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या सरकार वास्तव में अपनी कार्यशैली में स्थायी बदलाव लाती है या फिर यह संकट भी पिछली बार की तरह मध्यम वर्ग की कमर तोड़कर निकल जाएगा।