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यह वायरस हड्डियों को खाकर इंसान को मार डालता है

  • नौ हजार साल पुरानी ममी में प्रमाण था

  • निरंतर शोध की वजह से रहस्य का पता चला

  • फेफड़ों के पास की अस्थियों पर हमला हो रहा है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः टीबी यानी तपेदिक की बीमारी हमेशा से दुनिया को परेशान करती रही है। पहले इसे लाइलाज बीमारी माना जाता था। बाद में इसकी दवा की खोज हुई। दवा बनकर तैयार होने के बाद टीबी के विषाणुओं ने खुद में तब्दीली की। जिसका असर यह हुआ कि पहले जो दवा कारगर थी, वह पूरी तरह बेकार हो गयी।

समय बीतने के साथ साथ अलग अलग चरणों में टीबी के विषाणुओं को समाप्त करने के लिए दवा भी विकसित की गयी है। अब अमेरिका में हुई कुछ मौतों का रहस्य इतने दिनों बाद खुला है। करीब पंद्रह साल पहले नॉर्थ कैरेलिया में इस बीमारी से कुछ लोग मरे थे। उनका ईलाज जारी होने के बाद भी दवा का असऱ इन मरीजों पर क्यों नहीं हुआ, यह सवाल अनुत्तरित रह गया था। अब जाकर निरंतर शोध से पता चला है कि दरअसल मरीजों की हड्डियों को टीबी के वायरस ने खा लिया था। इसी वजह से उनकी मौत हुई थी।

ड्यूक विश्वविद्यालय की तरफ से जारी रिपोर्ट में इस बारे में जानकारी दी गयी है। यह बताया गया है कि उस काल में जो टीबी के मरीज थे उनके फेफड़ों के आस पास की हड्डियों को नये टीबी वायरस ने चबाकर खत्म कर दिया था। लेकिन उस वक्त इस वायरस के नये स्वरुप के बारे में जानकारी नहीं मिल पायी थी।

इतने दिनों के बाद यह रहस्य सुलझ पाया है। इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए वैज्ञानिकों के एक दल ने मिलकर काम किया है। इसी वजह से यह पता चल गया है कि इस टीबी के विषाणु के भीतर यह प्राचीन गुण फिर से लौट आया था। अस्थियों पर इस किस्म के हमला करने वाले टीबी के विषाणु प्राचीन काल में हुआ करते थे। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक आज से करीब नौ हजार वर्ष पूर्व इजिप्ट की कुछ ममियों में इसके प्रमाण मिले थे। इन ममियों के परीक्षण से पता चला था कि उसके फेफड़े की हड्डियां नष्ट हो गयी थी।

ऐसा उस काल के टीबी के विषाणु की वजह से हुआ था। इसलिए अब माना जा रहा है कि निरंतर अपना स्वरुप बदलते रहने के क्रम में टीबी के विषाणु फिर से इस प्राचीन स्वरुप में लौटे हैं। अभी अमेरिका में दो प्रतिशत टीबी के ऐसे मरीज पाये गये हैं, जिनपर ठीक ऐसा ही हमला हुआ है। इस काल के चिकित्सा विज्ञान के उन्नत होने की वजह से हड्डियों पर होने वाले इस अदृश्य हमले की पहचान कर पाना संभव हो गया है।

अब शोध दल मानता है कि दुनिया भर में फैले इस रोग के विषाणुओं में से कुछ ने वाकई अपना प्राचीन हथियार फिर से अपना लिया है। कोरोना के दौर में टीबी रोगियों की उपेक्षा की वजह से भी विषाणुओं को अपना स्वरुप बदलने की खुली छूट मिली थी। इसलिए फिर से टीबी के मरीजों की विस्तृत मेडिकल जांच की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है।

ड्यूक विश्वविद्यालय के डाक्टर जैसन स्टाउट का ऐसे मरीजों से सामना हुआ था। उनके पास आये छह मरीजों पर टीबी का संक्रमण उम्मीद से अधिक फैला हुआ था। इन छह में से चार लोगों के फेफड़ों के आस पास की हड्डियां भी क्षतिग्रस्त हुई थी। उस वक्त इस बारे में पक्के तौर पर कोई जानकारी नहीं मिल पायी थी। अब जाकर इस रहस्य को सुलझा लिया गया है। समझा जाता है कि इस किस्म के संक्रमण से पीड़ित होने वाला पहले रोगी वियतनाम से यह रोग लेकर लौटा था।

वहां पर वह चार सौ लोगों के साथ मिलकर काम किया करता था। अमेरिका लौटने के बाद उसकी सेहत बिगड़ने के बाद उसे फेफड़ों पर ऐसा हमला देखा गया था। उसके संपर्क में आने वालों को भी बचाव की दवा दी गयी थी। लेकिन उस समय यह पता नहीं चल पाया था कि ऐसा आखिर क्यों हुआ है। अब वैज्ञानिकों ने यह खोज निकाला है कि टीबी के विषाणु प्राचीन काल की तरह ही फिर से इंसानी अस्थियों पर हमला करने लगे हैं।