पराली जलाने में सैटेलाइटों को चकमा दे रहे हैं
आधुनिक तकनीक को भी चकमा दे रहे
सैटेलाइट का समय देखकर पराली जला रहे
आसमान पर धुआं तो दर्ज किया जा रहा
राष्ट्रीय खबर
चंडीगढ़ः भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने पोखरण परमाणु परीक्षणों के दौरान उपग्रहों से बचने की कला में महारत हासिल की थी। आज पंजाब और हरियाणा के किसान खेत में पराली जलाने की घटनाओं का पता लगाने वाले उपग्रहों को चकमा देने के लिए वैसी ही रणनीति अपना रहे हैं। मई 1998 में डॉ. अब्दुल कलाम सहित वैज्ञानिकों के नेतृत्व में भारत ने राजस्थान के पोखरण में शक्ति श्रृंखला के तहत पाँच परमाणु परीक्षण किए थे। इस दौरान कक्षा में तैनात सबसे अत्याधुनिक अमेरिकी जासूसी उपग्रहों से अपनी महत्वपूर्ण तैयारियों को सफलतापूर्वक छिपाया गया था।
अब किसानों को यह समझ आ गया है कि उपग्रह केवल तभी देख सकते हैं जब वे उनके खेतों के ठीक ऊपर से गुजरते हैं। यदि उपग्रहों की निगरानी के निर्धारित समय (विंडो) के बाहर खेतों में आग लगाई जाती है, तो कई आग उपग्रह की पकड़ में आने से छूट जाती हैं। इस चुनौती का नया उदाहरण इंटरनेशनल फोरम फॉर एनवायरनमेंट, सस्टेनेबिलिटी एंड टेक्नोलॉजी द्वारा विकसित एक नया मल्टी-सैटेलाइट मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म फायर वॉच है। इसे इसलिए डिज़ाइन किया गया है क्योंकि पारंपरिक आग-गिनती के तरीके वास्तविक स्थिति का केवल एक हिस्सा ही दिखा पाते हैं।
आईफॉरेस्ट के सीईओ डॉ. चंद्र भूषण ने कहा, वर्तमान निगरानी ध्रुवीय-कक्षा (पोलर-ऑर्बिटिंग) उपग्रहों की आग की गिनती पर निर्भर करती है, जो पराली जलाने की एक अधूरी तस्वीर पेश करती है। प्रभावी कदम उठाने के लिए हमें न केवल यह जानने की जरूरत है कि कितनी आग का पता चला, बल्कि यह भी कि आग कहाँ और कब लगी और कितनी भूमि प्रभावित हुई।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2021 में दर्ज 80,000 घटनाओं के शीर्ष स्तर से गिरकर 2025 में पराली जलाने के मामले घटकर लगभग 6,000 रह गए हैं। सख्त प्रवर्तन, जुर्माने, मशीनरी सब्सिडी और जागरूकता अभियानों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसान अब उपग्रहों के गुजरने के समय से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके हैं। वर्तमान में आग की निगरानी मुख्य रूप से नासा के टेरा और एक्वा उपग्रहों पर लगे मोडिस सेंसर और सुओमी एनपीपी व एनओएए-20 पर लगे वीआईआईआरएस सेंसर पर आधारित है। इन चारों प्रणालियों की सीमा यह है कि ये एक निश्चित समय (मुख्य रूप से दोपहर) पर ही निगरानी करती हैं।