जमीनी युद्ध में यूक्रेन अब टेक्नोलॉजी के सहारे लड़ रहा है
इन्हें रिमोट से संचालित करते हैं
जान बचाने के लिए तकनीक प्रयोग
ड्रोन और निगरानी से बचाव का तरीका
कीव: यूक्रेन के युद्ध के मैदान में तकनीक और रणनीति का एक नया समीकरण देखने को मिल रहा है। किल ज़ोन (अत्यधिक ख़तरनाक युद्ध क्षेत्र) में तैनात यूक्रेनी सैनिक अब पैदल सेना के पारंपरिक हथियार आरपीजी (रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड) को खुद चलाने के बजाय ज़मीनी रोबोट्स पर लगा रहे हैं। युद्ध क्षेत्र के लगातार ख़तरनाक होते माहौल के बीच सैनिकों की जान बचाने और सटीक हमले करने के लिए इस नई तकनीक का सहारा लिया जा रहा है।
यूक्रेन की अग्रिम पंक्ति (फ्रंटलाइन) पर किल ज़ोन लगभग 50 किलोमीटर तक फैला हुआ है। इस पूरे इलाके में निगरानी और आत्मघाती ड्रोनों की इतनी भारी मौजूदगी है कि सैनिकों के लिए किसी भी प्रकार की हलचल जानलेवा साबित हो सकती है। ऐसी स्थिति में सैनिकों के लिए आरपीजी की मारक सीमा (रेंज) तक पहुँचना लगभग असंभव हो चुका है।
यूक्रेनी रोबोट निर्माता कंपनी डेवड्रॉइड के रिसर्च एंड डेवलपमेंट निदेशक ओलेग फेडोरीशिन ने बताया, युद्ध की शुरुआत में आरपीजी पैदल सेना का प्रमुख हथियार था, लेकिन आज के दौर में खुद को सुरक्षित रखते हुए आरपीजी से सीधा हमला करना किसी के लिए भी संभव नहीं रह गया था। इसी चुनौती ने इस नए नवाचार को जन्म दिया।
शुरुआत में सैनिकों ने मशीन गन से लैस रोबोट्स पर आरपीजी लॉन्चर लगाकर परीक्षण किया। ये मानवरहित ज़मीनी वाहन दुश्मन के ठिकानों और बख्तरबंद गाड़ियों के बेहद करीब तक पहुँचकर हमला करने में सक्षम हैं, जबकि इन्हें संचालित करने वाले सैनिक किलोमीटर दूर सुरक्षित दूरी पर बने रहते हैं।
सैन्य ब्रिगेड द्वारा किए गए इस प्रयोग के बेहतरीन परिणाम सामने आए हैं, जिसके बाद अब इस मॉडल को व्यापक स्तर पर लागू करने की योजना बनाई जा रही है। सस्ते ड्रोनों के अत्यधिक उपयोग ने ज़मीनी जंग के नियमों को पूरी तरह बदल दिया है। डेवड्रॉइड के अलावा यूक्रेनी कंपनी टेमरलैंड ने भी अपना ग्नॉम-वीपी रोबोटिक प्लेटफॉर्म तैयार किया है, जो एक साथ दो आरपीजी-7 लॉन्चर ले जाने, गोलीबारी करने और बारूदी सुरंगें बिछाने में सक्षम है। यह बदलाव साफ़ दर्शाता है कि आने वाले समय में ज़मीनी जंग का पूरा दारोमदार इंसानों के बजाय रोबोटिक और मानवरहित तकनीकों पर टिकने वाला है।