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रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने फिर से यूपी की वोटर लिस्ट की जांच की

साफ्टवेयर के जरिए हटाये गये अनेक फॉर्म

आंकड़ों की जांच का निष्कर्ष निकाला

बीस प्रतिशत विलोपन चुनाव आयोग से

साफ्टवेयर के हस्तक्षेप की बात प्रमाणित

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः चुनाव आयोग की गड़बड़ियों की व्यापक जांच करने वाले रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने फिर से यूपी की गड़बड़ी का एक और खुलासा कर दिया है। उसकी ताजी रिपोर्ट में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान भारत निर्वाचन आयोग द्वारा बिना कोई कारण बताए अधिकारियों से 85,854 मतदाताओं के नाम हटाने वाले फॉर्मों पर जबरन हस्ताक्षर कराने का गंभीर मामला सामने आया है। द रिपोर्टर्स कलेक्टिव की एक खोजी रिपोर्ट के अनुसार, ये सभी विलोपन फॉर्म कानूनन निर्धारित अंतिम समय-सीमा (डेडलाइन) समाप्त होने के बाद जमा किए गए थे।

यह सामूहिक विलोपन अनुरोध 6 जनवरी 2026 (जब मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित हुआ था) और 10 अप्रैल (जब अंतिम मतदाता सूची जारी की गई थी) के बीच दावे और आपत्तियों की अवधि के दौरान चुनाव अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किए गए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर प्रदर्शित 4.3 लाख से अधिक फॉर्म 7 आपत्तियों के आंकड़ों का डेटा विश्लेषण करने पर पता चला कि इनमें से 20 प्रतिशत विलोपन अनुरोध सीधे चुनाव आयोग के विधानसभा-स्तरीय अधिकारियों द्वारा जमा किए गए थे।

विशेष जांच में पाया गया कि ये फॉर्म अधिकारियों ने स्वयं नहीं भरे थे, बल्कि ईसीआई के सॉफ्टवेयर ‘इरोनेट’ (ERONET) ने सुनवाई के दौरान स्वचालित (ऑटो-जनरेट) रूप से तैयार किए थे। इन फॉर्मों में अधिकारियों के डिजिटल हस्ताक्षर पहले से मौजूद थे, जिन्हें मंजूरी के लिए उच्च अधिकारियों को भेजा गया था। कानूनन चुनाव अधिकारियों का काम आपत्तियों का न्यायनिर्णयन (फैसला) करना होता है, लेकिन इस प्रक्रिया में वे खुद ही शिकायतकर्ता और न्यायाधीश दोनों की भूमिका निभा रहे थे।

नियमानुसार, फॉर्म 7 के तहत विलोपन का अनुरोध करते समय स्पष्ट कारण (जैसे- मृत्यु, कम उम्र, अनुपस्थिति/स्थायी प्रवास, दोहरा नाम या गैर-नागरिक होना) चुनना अनिवार्य है। हालांकि, जांच में यह भी खुलासा हुआ कि कुल 1,10,476 विलोपन अनुरोध कानूनी समय-सीमा समाप्त होने के बाद स्वीकार किए गए। इसके अलावा, तरबगंज और पीलीभीत जैसी विधानसभाओं में एक ही नाम से सैकड़ों अर्जियां मुख्य रूप से मुस्लिम मतदाताओं के खिलाफ दायर की गईं। अकेले तरबगंज में ‘रेशमा’ नाम से 188 आपत्तियां एक ही तारीख पर एक ही बूथ के लोगों के खिलाफ दर्ज की गई थीं।