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ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया.. .. .. ..

भारतीय राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक अजीब किस्म की अफरा-तफरी का माहौल है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग के इर्द-गिर्द घूम रहे विवादों ने देश के सियासी पारे को उफान पर पहुँचा दिया है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है देश की युवा पीढ़ी यानी जेन ज़ेड ने। इस डिजिटल पीढ़ी ने अपने तीखे व्यंग्य, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और मीम्स (Memes) के ज़रिए सरकार और प्रशासनिक अमले की पूरी खटिया खड़ी कर दी है।

बचपन से ही हाथों में स्मार्टफोन थामे और इंटरनेट की तेज़ रफ्तार में पले-बढ़े इस युवा वर्ग की बोलचाल की शैली, सोच और अभिव्यक्ति का तरीका पारंपरिक राजनीति से बिल्कुल अलग है। वे भारी-भरकम राजनीतिक बयानों के बजाय चुटीले मीम्स, शॉर्ट वीडियो और हैशटैग्स के माध्यम से किसी भी गंभीर मुद्दे का ऐसा अनूठा मज़ाक उड़ा देते हैं कि सत्ता में बैठे दिग्गज सोच में पड़ जाते हैं कि आखिर इस पर प्रतिक्रिया कैसे दें। जब सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आती है, तो सरकार के पारंपरिक जनसंपर्क और रक्षात्मक बयान पूरी तरह बेअसर साबित होने लगते हैं।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए सत्ता के शीर्ष स्तर से यह कोशिश ज़रूर हुई होगी कि तीनों चुनाव आयुक्तों की एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई जाए, ताकि उठे हुए तीखे सवालों और विवादों की दिशा को किसी तरह पुरानी लीक पर मोड़ा जा सके। लेकिन ऐसा संभव नहीं हो सका। ज़ाहिर है कि आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्त इस तरह की साझे तौर पर सफाई देने या किसी विवाद का हिस्सा बनने के लिए तैयार नहीं हुए होंगे। इस आंतरिक मतभेद और बढ़ते जन-असंतोष का नतीजा यह हुआ है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश बाबू की व्यक्तिगत सुरक्षा को कई गुना बढ़ाना पड़ा है। अब हालत यह है कि सड़कों और चौक-चौराहों पर आम लोगों के रोके जाने या सवाल पूछे जाने का खतरा इतना बढ़ गया है कि सुरक्षा बल हर पल मुस्तैद हैं। पता नहीं किस मोड़ पर कौन सा उग्र नागरिक या नरसिंह रूपी जन-आक्रोश सामने आ जाए।

इस पूरे विवाद का दूसरा सबसे गौर करने लायक पहलू यह है कि विपक्षी दलों के हाथ इतनी सटीक, अंदरूनी और चौंकाने वाली जानकारियाँ कहाँ से लग रही हैं? इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि दिल्ली के प्रशासनिक दरबार यानी ब्यूरोक्रेसी के भीतर भी एक बड़ा उथल-पुथल चल रहा है। कई वरिष्ठ और निष्पक्ष अधिकारी अब गृह मंत्री अमित शाह या प्रशासनिक दबाव की धौंस में आने से साफ इनकार कर रहे हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण और मतदाता सूचियों में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग का बार-बार यू-टर्न लेना ही इस बात का पुख्ता सबूत है कि पर्दे के पीछे पहले कैसा सियासी खेल खेला गया था, जिसकी बदौलत कई राज्यों में चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सरकारें बनाई गईं।

राजनीतिक हालात की इस लाचारी, घटते भरोसे और अनिश्चितता को देखकर शकील बदायूनी की लिखी और बेगम अख्तर द्वारा अमर की गई मशहूर हिंदी गजल की पंक्तियाँ याद आती हैं:

इसी बात पर एक प्रमुख हिंदी गजल की याद आती है, जिसे हम आज भी गाहे बगाहे सुन लेते हैं। इस प्रसिद्ध गजल को शकील बदायूनी ने लिखा था और सबसे पहले बेगम अख्तर ने इसे गाया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

यूँ तो हर शाम उम्मीदों में गुज़र जाती थी

आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया

कभी तक़्दीर का मातम कभी दुनिया का गिला

कभी तक़्दीर का मातम कभी दुनिया का गिला

मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

मंज़िल-ए-इश्क़ में हर गाम पे रोना आया

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का शकील

मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया

ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

लेकिन अब यही एक मुद्दा पूरी भारतीय जनता पार्टी के लिए गले की फाँस बन चुका है। तकनीकी और संवैधानिक रूप से सारे आरोप चुनाव आयोग की निष्पक्षता और कार्यप्रणाली पर लग रहे हैं, लेकिन बचाव में ढाल बनकर भाजपा के नेता और प्रवक्ता सामने आ रहे हैं। इस पर आम जनता उल्टे तीखे सवाल पूछ रही है कि जब आरोप आयोग पर हैं, तो भाजपा सफाई क्यों दे रही है? चुनाव आयोग को खुद सामने आकर जनता को जवाब देने दिया जाए। कुल मिलाकर, किसी एक व्यक्ति या संस्थागत मशीनरी की मदद से चुनाव जीतने का जो खेल लंबे समय से चल रहा था, अब वही खेल सत्ताधारी दल के गले में काँटे की तरह अटक गया है।