Breaking News in Hindi

अपराजेय से रणछोड़ तक पहुंचे नरेंद्र मोदी

पिछले 17 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच का लगभग बीस दिनों का यह कालखंड भारतीय राजनीति के एक बेहद दिलचस्प, लगभग निर्मम विरोधाभास को उजागर करता है। एक ऐसे नेता के जीवन में, जिन्होंने अपनी राजनीति की कला को निखारने में एक चौथाई सदी (25 साल) खर्च कर दी—पहले गुजरात के हिंदू हृदय सम्राट के रूप में और बाद में नई दिल्ली की सत्ता के सिंहासन पर विराजमान एक अजेय शासक के रूप में—यह समय एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हो रहा है।

हालांकि, यह मील का पत्थर उनकी ताकत के चरम शिखर पर नहीं, बल्कि अक्टूबर 2001 के बाद से उनके राजनीतिक प्रभाव में आई सबसे स्पष्ट गिरावट के बीच आ रहा है। नरेंद्र मोदी की सार्वजनिक छवि और एक राजनीतिक-चुनावी परिघटना के रूप में उनका उभार हमेशा से इस विचार पर टिका रहा था कि वह एक अजेय नेता हैं। उनके भीतर शासन और राजनेता के रूप में अतीत के हर रिकॉर्ड को तोड़ने की एक अचूक और छुपी हुई नहीं, बल्कि स्पष्ट ऊर्जा रही है।

जब नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बागडोर संभाली थी, तब शायद ही किसी ने यह कल्पना की होगी कि यह नेता आने वाले दशकों में भारतीय राजनीति की धुरी बन जाएगा। शुरुआती वर्षों में उन्होंने खुद को एक ऐसे प्रशासक के रूप में गढ़ा, जो विकास, गतिशीलता और सुशासन का पर्याय था। वाइब्रेंट गुजरात जैसे आयोजनों ने राज्य को औद्योगिक मानचित्र पर एक नई ऊँचाई दी।

धीरे-धीरे, उनकी राजनीतिक शैली केवल एक राज्य के नेता तक सीमित नहीं रही, बल्कि वह राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर एक मजबूत और निर्णायक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित होते चले गए। वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय इतिहास का एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। दशकों बाद देश ने किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत के साथ केंद्र में आते देखा और इसके केंद्र में नरेंद्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व था। उनके चुनाव अभियान ने सबका साथ, सबका विकास और एक मजबूत, भ्रष्टाचार-मुक्त भारत के सपने को घर-घर तक पहुँचाया।

इसके बाद के वर्षों में, उनकी राजनीतिक रणनीति ने हर मोर्चे पर अपनी श्रेष्ठता साबित की। चाहे वह चुनावी प्रबंधन हो, कड़े नीतिगत फैसले लेना हो, या फिर राष्ट्रवाद की प्रखर धारा को मुख्यधारा की राजनीति बनाना हो—मोदी ने हर बार खुद को राजनीतिक मोर्चे पर एक अजेय खिलाड़ी साबित किया। आलोचकों और समर्थकों, दोनों ने इस बात को स्वीकार किया कि भारतीय राजनीतिक इतिहास में शायद ही किसी अन्य नेता ने जनमानस पर इस तरह की गहरी और लंबी छाप छोड़ी हो।

राजनीति का इतिहास इस बात का गवाह है कि समय और परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। आज जब नरेंद्र मोदी अपने राजनीतिक सफर के एक और पड़ाव पर हैं, तो देश का राजनीतिक परिदृश्य काफी बदल चुका है। 2024 के आम चुनावों के बाद आए चुनावी नतीजों और उसके बाद की राजनीतिक सरगर्मियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि एकछत्र राज और पूर्ण प्रभुत्व का वह दौर अब एक नए और अधिक जटिल चरण में प्रवेश कर चुका है।

इस बीच उनके द्वारा कही गयी बात, ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा का नारा भी बेमानी साबित हो चुका है। दिल्ली दरबार का काम काज कैसे चल रहा है और फटी चप्पलों में चलने वाले भाजपा नेता आज स्कॉर्पियो गाड़ी में कैसे चल रहे हैं, यह जनता जान चुकी है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती मुखरता, सामाजिक-आर्थिक मुद्दों जैसे कि बेरोजगारी और महंगाई पर जनता की बढ़ती अपेक्षाएं, और विपक्षी दलों द्वारा एकजुट होकर दी जा रही कड़ी टक्कर ने सत्ता पक्ष के लिए राह को पहले जैसी आसान नहीं रहने दिया है।

जिस अजेयता के भाव को दशकों तक एक अचूक कवच माना जाता था, उस पर अब नए किस्म के राजनीतिक समीकरणों और लोकतांत्रिक बहसों का दबाव साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। यह दौर इस बात का प्रतीक है कि भारतीय मतदाता अब केवल करिश्माई नेतृत्व के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी तात्कालिक जरूरतों, रोजगार, और जीवन की बुनियादी सच्चिदानंद वास्तविकताओं के आधार पर भी बड़े फैसले ले रहा है।

लोकतंत्र की यह खूबी है कि वह किसी भी नेता को अनंत काल तक एक ही स्थिति में नहीं रहने देती। यह संक्रमण काल केवल एक राजनीतिक व्यक्ति की यात्रा का नहीं, बल्कि पूरे देश के लोकतांत्रिक स्वास्थ्य का भी परिचायक है। जब राजनीतिक प्रभुत्व अपनी चरम सीमा से नीचे उतरकर एक संतुलित और बहुवर्गीय व्यवस्था की ओर मुड़ता है, तब लोकतंत्र की असली ताकत बाहर आती है। नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर का यह नया अध्याय यह सिखाता है कि राजनीति में कोई भी मुकाम अंतिम या अपरिवर्तनीय नहीं होता।