सुप्रीम कोर्ट ने तमाम गोपनीय दस्तावेज मांग लिये
पहली बार सीमा खन्ना लपेटे में आयी
बहुमत का फैसला दरकिनार किया गया
बिना किसी को सुने एकतरफा फैसला नहीं
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम और संवेदनशील मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को एकतरफा तौर पर निलंबित करने की मांग को फिलहाल ठुकरा दिया है। हालांकि, अदालत ने चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, सीईसी ज्ञानेश कुमार, अन्य चुनाव आयुक्तों (डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी), उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग और डीजी (आईटी) सीमा खन्ना को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।
यह पूरा कानूनी विवाद द इंडियन एक्सप्रेस की एक सनसनीखेज मीडिया रिपोर्ट के बाद सामने आया। इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयोग के भीतर विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया से जुड़े 14 बेहद अहम और दूरगामी परिणाम वाले निर्णय कथित तौर पर केवल मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकतरफा ले लिए गए, जबकि इन पर दो अन्य चुनाव आयुक्तों ने अपनी स्पष्ट आपत्तियां दर्ज कराई थीं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह प्रक्रिया बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय की मूल भावना के पूरी तरह खिलाफ है।
याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत के समक्ष दलील दी कि मुख्य चुनाव आयुक्त अधिनियम की धारा 18 यह अनिवार्य करती है कि चुनाव आयोग के फैसले यथासंभव सर्वसम्मति से होने चाहिए और यदि सर्वसम्मति न बने, तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए।
वकील ने धारा 16 के उस प्रावधान का भी जिक्र किया जो सीईसी को आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है, और इसे देश के लोकतंत्र के लिए गंभीर स्थिति करार दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इस मामले में तत्काल अंतरिम उपाय नहीं किए गए, तो नागरिकों का मतदान के अधिकार से विश्वास उठ सकता है और देश में गंभीर हालात पैदा हो सकते हैं। जब बेंच ने सवाल किया कि यदि सीईसी को निलंबित कर दिया जाता है, तो चुनाव कौन कराएगा, तो याचिकाकर्ता की ओर से सुझाव दिया गया कि बाकी के दो चुनाव आयुक्त मिलकर कामकाज संभाल सकते हैं।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी भी उच्च पदस्थ संवैधानिक पदाधिकारी के खिलाफ बिना उनका पक्ष सुने या बिना ठोस साक्ष्यों के एकतरफा अंतरिम आदेश पारित नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत केवल अखबारों की रिपोर्टों के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकती कि सभी फैसले एकतरफा थे। हालांकि, सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि कानून के प्रावधान अनिवार्य हैं और अदालत यह अपेक्षा करती है कि उनका पूरी तरह पालन हो। यदि कोई उल्लंघन पाया जाता है, तो अदालत उचित कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगी।