जज के पुत्र की वकालत पर नया सवाल
दोनों ही मामले में पैरवीकार पुत्र था
अब मामले की सुनवाई की मांग हुई
खंडपीठ का खंडित फैसला भी आया
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः हाल ही में सामने आई एक नई जानकारी के बाद न्यायिक औचित्य को लेकर कुछ गंभीर और बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। इस बात का खुलासा हुआ है कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के सुपुत्र मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में भारत निर्वाचन आयोग के स्थायी वकील हैं।
यह मामला तब और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब यह पता चलता है कि जस्टिस शर्मा उस दो-न्यायाधीशों की बेंच का हिस्सा थे, जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाले 2023 के कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी। गत 23 सितंबर को, जस्टिस शर्मा के इस विचार के कारण कि मामले की सुनवाई एक संविधान पीठ द्वारा की जानी चाहिए, इस मामले को अंततः संविधान पीठ के पास भेजना पड़ा, जबकि जस्टिस दीपांकर दत्ता की राय इसके विपरीत थी। इसका व्यावहारिक असर यह हुआ कि भारतीय लोकतंत्र के अस्तित्व से गहराई से जुड़े इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई में अब और अधिक देरी होगी।
संयोगवश, ठीक उसी दिन जस्टिस शर्मा की अध्यक्षता वाली एक अन्य बेंच ने नोएडा की जिला मजिस्ट्रेट मेधा रूपम द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें अप्रैल के श्रमिक विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में एक छात्र को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत हिरासत में लेने के आदेश के लिए उनकी आलोचना करने वाले इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने छात्र को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था, जिसे रूपम के वेतन से वसूला जाना था। जस्टिस शर्मा की बेंच ने रूपम को उनके खिलाफ उच्च न्यायालय की कड़ी टिप्पणियों और वसूली के आदेश पर रोक लगाते हुए अंतरिम राहत प्रदान की।
ये परिस्थितियां एक बेहद दिलचस्प और संदेहास्पद मोड़ तब ले लेती हैं जब यह तथ्य सामने आता है कि मेधा रूपम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की सुपुत्री हैं। जस्टिस शर्मा की बेंच के समक्ष मेधा रूपम के मामले की लिस्टिंग ने पहले ही कड़े सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि जस्टिस शर्मा की बेंच के पास इस विषय की सुनवाई का नियमित रोस्टर नहीं था।
इसके अलावा, जस्टिस नागरत्न की अध्यक्षता वाली एक अन्य बेंच पहले से ही इससे जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी। इसलिए, प्रचलित रोस्टर के विपरीत इस मामले को विशेष रूप से जस्टिस शर्मा की बेंच को सौंपे जाने से कई लोगों के मन में शंकाएं पैदा हो गई हैं।