किसी के पाले में सूखा तो किसी पर बाढ़ का प्रकोप
बहाली घोटाला राज्य का बहुत बड़ा मुद्दा
खनिज विधेयक पर भी जनता की नजर
अधिक सक्रियता के लायक माहौल भी नहीं
राष्ट्रीय खबर
रांचीः कई मुद्दों के एक साथ सामने आ जाने की वजह से झारखंड के राजनीतिक दलों के परेशानी होने लगी है। दूसरी तरफ ग्रामीण इलाके में समर्थकों के कृषि कार्य में व्यस्त होने की वजह से भी नेताओँ को जनबल की कमी महसूस हो रही है। झामुमो और कांग्रेस के लिए नौकरी में भ्रष्टाचार के मामले का पेंच फंसा है।
दरअसल दोनों दलों की मजबरी को समझते हुए ही बार बार भाजपा इस बहाली घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने की मांग कर रही है। यूं तो झारखंड सीआईडी मामले की जांच कर रही है पर बिल कितना गहरा है और अंदर कौन कौन से प्राणी छिपे हुए हैं, इसका भय तो जांच एजेंसी को भी सता रहा है। लगातार कार्रवाई के दौरान जो तथ्य सामने आये हैं, उससे तो साफ है कि इस भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हैं। लेकिन जांच का दूसरा सिरा भाजपा के शासन काल तक भी जाता है, जिसकी जानकारी लोगों को है पर मामले की गहराई से जांच कभी नहीं की गयी। सही जांच होने पर तो विधानसभा में हुई बहाली की फाइल भी अब तक निपट गयी होती, जिसमें कई बड़े नेताओं ने अपने परिचितों को उपकृत किया था।

अब दूसरी तरफ देखें तो भाजपा के लिए खनिज प्रधानता वाले राज्य झारखंड में एमएमडीआर बिल के आने से आम जनता को क्या लाभ होगा, यह बताना कठिन हो रहा है। यह अलग बात है कि वे खुलकऱ इसका समर्थन कर रहे हैं पर इसके पक्ष में वैसी दलीलें नहीं दे पा रहे हैं जो जनता को भरोसेमंद लगे। झारखंड की आमदनी रोककर दिल्ली का जेब भरने से राज्य का क्या भला होगा, इसके समर्थन में कोई दलील अब तक सामने नहीं आयी है। सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी से जनता झांसे में नहीं आयेगी, यह भी लोग अच्छी तरह समझ रहे हैं।
इनसे अलग अब पर्दे के पीछे से ईसाई आदिवासी और सरना का खेल भी चल रहा है पर हेमंत सरकार के होने की वजह से इस आग को हवा नहीं मिल पा रही है। इसका मकसद दरअसल भाजपा के पाले में उस आदिवासी वोट को वापस लाना है, जो उनके छिटक गया है। परेशानी की बात यह है कि इस काम को अंजाम देने में सक्षम अर्जुन मुंडा सरीखे नेता फिलहाल साइड लाइन पर है। लिहाजा सभी के पास अपनी दलील और अपनी मजबूरी है। इसलिए कहा जा सकता है कि बरसात के मौसम में सभी राजनीतिक दल अभी मेहरा(नमीयुक्त) हो गये हैं और ठीक से जल नहीं रहे हैं।