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मेलघाट और पेंच टाइगर रिजर्व में गिद्ध पुनरुद्धार सफल

विलुप्ति के कगार पर पहुंचे जंगल के सफाई पक्षी लौटे

इंसानी बस्ती से दूर यह प्रयोग सफल रहा

बाघ के इलाके में उनकी आबादी बढ़ी है

सभी में जीपीएस चिप लगाये हुए थे

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः महाराष्ट्र के मेलघाट और पेंच टाइगर रिजर्व भारत में पिंजरों में पाले गए (कैप्टिव-ब्रेड) गिद्धों के पुनरुद्धार और उन्हें पुनः जंगल में बसाने के सबसे सफल केंद्रों के रूप में उभरे हैं।  अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस के अवसर पर बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 के बीच इन दोनों रिजर्वों में कुल 29 गिद्धों को खुले जंगल में छोड़ा गया था।

इनमें से 78 प्रतिशत तक गिद्धों ने सफलतापूर्वक खुद को प्राकृतिक माहौल में ढाल लिया है और वे जीवित हैं।  परियोजना का विवरण और रणनीति:पक्षियों की उत्पत्ति: इन गिद्धों का प्रजनन हरियाणा के पिंजौर स्थित जटायु संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र में कराया गया था।  पेंच टाइगर रिजर्व: दिसंबर 2025 में पेंच में 9 सफ़ेद-पीठ वाले और 5 लंबी चोंच वाले कुल 14 गिद्ध छोड़े गए, जहाँ 9 महीनों के भीतर 78 फीसद उत्तरजीविता दर दर्ज की गई।

मेलघाट टाइगर रिजर्व में जनवरी 2026 में मेलघाट की सोमथाना रेंज से 15 लंबी चोंच वाले गिद्धों को ‘सॉफ्ट-रिलीज’ तकनीक से छोड़ा गया, जिन्होंने 60 फीसद की उत्तरजीविता दर हासिल की है।  संस्थान के निदेशक किशोर रिठे के अनुसार, पहले पक्षियों को जहाँ छोड़ा जाता था, उसकी तुलना में शिकार से भरपूर और मानवीय गतिविधियों से मुक्त संरक्षित बाघ आवासों में री-रिलीज बाड़े स्थापित करना बेहद कारगर साबित हुआ है।

सभी 29 गिद्धों को जीएसएम और सैटेलाइट टैग से लैस किया गया था। ट्रैकिंग आंकड़ों से पता चला है कि मेलघाट से छोड़ी गई टैग वाली एक मादा गिद्ध ने मध्य भारत के मध्य प्रदेश स्थित कुनो, श्योपुर और राजस्थान के रणथंभौर तक 4,911 किलोमीटर से अधिक का सफर तय किया। वहीं ‘X65’ नामक अन्य मादा गिद्ध ने नासिक, सूरत, जलगांव और कान्हा होते हुए 4,257 किलोमीटर की दूरी तय की।

यह डेटा साबित करता है कि ये पक्षी प्राकृतिक रूप से भोजन की तलाश करने में सक्षम हैं।  गिद्धों की आबादी में 1990 के दशक में मवेशियों की दवा डाइक्लोफेनैक के कारण 99 प्रतिशत की भारी गिरावट आई थी। ऐसे में मेलघाट और पेंच के ये परिणाम घटती आबादी को संबल देने, पारिस्थिकी तंत्र में शव-निपटान की श्रृंखला को पुनः मजबूत करने और भारत के इस महत्वपूर्ण पक्षी के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हैं।