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किधर जा रहे हैं देश के सरकारी बैंक

27 अगस्त को, साल 2026 से ब्रिटेन में रह रहे भगोड़े आर्थिक अपराधी विजय माल्या ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक शिकायत पोस्ट कर बैंकिंग प्रणाली का मज़ाक उड़ाया। उद्योगपति सुभाष चंद्रा ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के तहत 22,006.57 करोड़ के बकाए का निपटारा महज 6.5 करोड़ में किया था।

माल्या ने लिखा, यदि यह सच है, तो मेरे मित्र सुभाष को बहुत-बहुत बधाई। बैंकों और सरकार ने स्वीकार किया है कि उन्होंने मुझसे 6,203 करोड़ के फैसले के बकाए के मुकाबले 14,100 करोड़ रुपये वसूल किए हैं। कई अन्य उधारकर्ताओं ने बहुत कम राशि में निपटारा किया है। मुझे लगता है, यह भारतीय ऋण समाधान का न्याय है।

मीडिया में कोई सवाल नहीं उठाएगा। विडंबना यह है कि जो व्यक्ति डूबे हुए कर्ज का पर्याय बन चुका था, वही शिकायत कर रहा था कि उससे जरूरत से ज्यादा वसूली की गई है। हर कुछ महीनों में, सोशल मीडिया पर एक स्क्रीनशॉट वायरल होता है: इरादतन चूककर्ताओं की सूची, बट्टे खाते में डाले गए कर्जों का कुल योग, और एक कैप्शन जो पूछता है कि 20,000 की चूक पर एक छोटे कर्जदार की गाय क्यों जब्त कर ली जाती है, जबकि 9,000 करोड़ का बकायेदार उद्योगपति अपने प्राइवेट जेट में घूमता है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन भाग गया, बल्कि सवाल यह है कि कितना पैसा वापस आया।

जनता के आक्रोश की वजह ज्यादातर सुर्खियां होती हैं—हालिया मामला सुभाष चंद्रा के केस को गलत तरीके से जोड़ने और इस दावे से जुड़ा है कि किसी भी बैंक का शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्ति अनुपात कुल ऋण के 1 प्रतिशत से अधिक नहीं है। सकल एनपीए बैंक को सुरक्षा देने वाले प्रावधानों (प्रोविज़न्स) से पहले का कुल डिफॉल्ट—जो मार्च 2018 में 14.58 प्रतिशत के शिखर पर था, मार्च 2026 तक घटकर 1.93 प्रतिशत पर आ गया। ये आंकड़े संकेत देते हैं कि एक दशक पहले का बैंकिंग संकट अब समाप्त हो चुका है।

यह अनुपात वसूली की जिम्मेदारी के बदलते स्वरूप को दर्शाता है। वित्त मंत्रालय स्पष्ट करता है कि यह केवल एक लेखांकन प्रक्रिया (अकाउंटिंग प्रोसीजर) है और उधारकर्ता पुनर्भुगतान के लिए उत्तरदायी रहता है। वसूली की जो भी प्रक्रिया होती है—चाहे ट्रिब्यूनल के माध्यम से हो, समझौते से हो या परिसंपत्ति (एसेट) बिक्री से—वह कभी वर्षों बाद होती है, तो कभी कभी होती ही नहीं।

शुद्ध एनपीए का आंकड़ा और वसूला गया रुपया दो अलग-अलग घड़ियां हैं, जिनमें से केवल एक ही तेज चल रही है। कर्ज बट्टे खाते में डालने की यह कहानी संसद के आंकड़ों में बड़े पैमाने पर दिखाई देती है। पिछले 11 वर्षों में लगभग 19 लाख करोड़ के ऋण बट्टे खाते में डाले गए हैं। लेकिन इसकी तुलना में वसूली बेहद धीमी रही है जो बट्टे खाते में डाली गई रकम के एक तिहाई हिस्से के बराबर भी मुश्किल से है।

उदाहरण के लिए, पिछले 5 वर्षों में बट्टे खाते में डाले गए 9.23 लाख करोड़ में से केवल 2.10 लाख करोड़ की ही वसूली हो सकी। बट्टे खाते में डाले जाने के बाद, डूबा हुआ कर्ज राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण के पास पहुंचता है। जून 2026 तक, 14.27 लाख करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले 4.35 लाख करोड़ मूल्य के 1,480 दिवालिया मामलों का समाधान हुआ था। वसूली का यह अनुपात 31 प्रतिशत से भी कम है।

औसत आंकड़े वास्तविक खाई को छुपा देते हैं। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से मांगी गई एक सूचना के अधिकार से वसूली के अलग-अलग पहलू सामने आए—10 वर्षों में, बैंक ने छोटे और गरीब उधारकर्ताओं के बट्टे खाते में डाले गए कर्ज का लगभग 74 प्रतिशत वसूल कर लिया था, जबकि बड़े कॉर्पोरेट खातों के लिए यह वसूली केवल 14.5 प्रतिशत थी।

भगोड़े केवल ऊपरी सतह भर हैं। जून 2025 तक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 1.77 लाख करोड़ के बकाए के साथ 2,104 ‘इरादतन चूककर्ताओं की सूचना दी। शुद्ध एनपीए अनुपात आपको बताता है कि बैंकिंग प्रणाली ने अपने पुराने नुकसानों की गिनती करना बंद कर दिया है। लेकिन क्या पैसा वापस खजाने में आया? सरकार की अपनी गिनती के अनुसार, इसका जवाब हर 100 में से सिर्फ 35 रुपये है।

इससे हम आसानी से समझ सकते हैं कि दरअसल देश की जनता के पैसों से जो बैंक संचालित हो रहे हैं, उनका असली मकसद गरीब का पैसा लेकर उसे अमीरों के बीच बांटना है। यह शाहखर्ची देश की जनता पर बोझ बनती जा रही है। दूसरी तरफ सरकार भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठी हुई है। असली सवाल है कि क्या देश के बैंकों के इस किस्म के कृत्य से देश और देश की जनता का वास्तव में कोई हित साधा जा रहा है या यह सरकारी लूट का एक हथियार भर बन गया है।