किसे होगा फायदा, भाजपा, बीजेडी या कांग्रेस?
तीनों दल फायदा उठाने की तैयारी में
मुद्दे पर राजनीतिक जंग तेज हो रही है
राज्य के नुकसान पर असली सवाल
प्रसन्न मोहंति
भुवनेश्वर: राजनीति में कई बार विचारधारा से अधिक स्थानीय मुद्दे और जनभावनाएं प्रभावी हो जाती हैं। ओडिशा में खनिज और खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर छिड़ा विवाद इसका स्पष्ट उदाहरण है। यह मुद्दा राज्य के तीनों मुख्य राजनीतिक दलों—सत्तारूढ़ भाजपा, विपक्षी बीजू जनता दल (बीजद) और कांग्रेस—के बीच ओडिशा के आर्थिक हितों की रक्षा का मुख्य मंच बन गया है।
पूर्व मुख्यमंत्री और बीजद अध्यक्ष नवीन पटनायक ने दावा किया है कि इस संशोधन से राज्य को सालाना लगभग एक लाख करोड़ रुपये का भारी वित्तीय नुकसान हो सकता है। उन्होंने राज्य के भाजपा सांसदों पर सवाल उठाते हुए विशेष विधानसभा सत्र बुलाने की मांग की है। दूसरी ओर, भाजपा के वरिष्ठ नेता धर्मेंद्र प्रधान ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि संशोधन से राज्य को एक भी पैसे का नुकसान नहीं होगा। वहीं, कांग्रेस ने संशोधन के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।
ओडिशा की अर्थव्यवस्था में लौह अयस्क, कोयला और बॉक्साइट जैसे प्राकृतिक संसाधनों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। भाजपा का तर्क है कि बीते दशक में पारदर्शी नीलामी और रॉयल्टी सुधारों से खनन राजस्व 5,000 करोड़ से बढ़कर 50,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। हालांकि, यह विश्लेषण जरूरी है कि यह वृद्धि केवल सुधारों से हुई या वैश्विक कीमतों, निर्यात और बढ़े हुए उत्पादन का नतीजा है।
इस पूरे विवाद में मुख्य केंद्र बिंदु खनन प्रभावित स्थानीय समुदाय होने चाहिए। जिला खनिज फाउंडेशन (DMF) में भारी धनराशि होने के बावजूद प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां बरकरार हैं। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा बीजद को पुनर्जीवित होने का अवसर देता है, जबकि भाजपा पर केंद्र व राज्य दोनों जगह सत्ता में होने के कारण अपने फैसलों को साबित करने की बड़ी जिम्मेदारी है। अंततः, राजनीतिक नफा-नुकसान से परे, नीतिगत पारदर्शिता और आंकड़ों के जरिए यह सुनिश्चित होना चाहिए कि ओडिशा की सीमित खनिज संपदा का स्थायी लाभ वहां की जनता और भावी पीढ़ियों को मिले।