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आदित्य-एल1 ने सौर ज्वालाओं से पहले संकेतों को पकड़ा

इसरो ने अपने सौर अभियान की उपलब्धियों की जानकारी दी

सौर अनुसंधान में बहुत बड़ी उपलब्धि

कई उपकरणों की मदद से किया काम

लैग्रेंज प्वाइंट 1 से लगातार शोध जारी

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः भारत की पहली समर्पित सौर वेधशाला, आदित्य-एल1 का उपयोग कर रहे वैज्ञानिकों ने सूर्य के वायुमंडल में छोटी, अल्पकालिक चमक (ब्राइटनिंग) की खोज की है, जो एक बड़ी सौर ज्वाला (सोलर फ्लेयर) के भड़कने से कुछ घंटे पहले दिखाई देती हैं। यह निष्कर्ष आदित्य-एल1 मिशन के तीन पेलोड से मिली पराबैंगनी और एक्स-रे टिप्पणियों पर आधारित है।

सौर ज्वालाएं सूर्य से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन के अचानक और तीव्र विस्फोट हैं, जो चुंबकीय ऊर्जा के मुक्त होने से उत्पन्न होती हैं। बड़ी सौर ज्वालाएं रेडियो संचार को बाधित कर सकती हैं, नेविगेशन सिस्टम में बाधा डाल सकती हैं, उपग्रहों को नुकसान पहुंचा सकती हैं और अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष यान के लिए विकिरण के खतरों को बढ़ा सकती हैं। इसलिए अंतरिक्ष मौसम के पूर्वानुमान में सुधार और आधुनिक तकनीकी बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए यह समझना आवश्यक है कि सौर ज्वालाएं कैसे उत्पन्न होती हैं।

सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज प्वाइंट 1 (एल1) से सूर्य का लगातार अवलोकन करते हुए आदित्य-एल1 कई तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ) में सौर गतिविधियों का निर्बाध दृश्य प्रदान करता है। इसका सोलर अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप  11 नियर-अल्ट्रावायलेट  फिल्टर में सूर्य का अवलोकन करता है। एसयूआईटी के साथ दो एक्स-रे उपकरण- सोलेक्स और हेलियोस सौर कोरोना में ऊर्जावान प्रक्रियाओं द्वारा उत्पादित एक्स-रे उत्सर्जन को मापते हैं।

कई सौर ज्वाला घटनाओं का विश्लेषण करते हुए, टीम ने मुख्य ज्वालाओं की शुरुआत से पहले सक्रिय क्षेत्रों में कई छोटे, अल्पकालिक चमक (क्षणिक घटनाओं) को पाया। इनमें से कुछ में एक्स-रे के संकेत भी दिखे, जिससे पता चलता है कि इनमें चुंबकीय ऊर्जा का उत्सर्जन शामिल है।

ये ज्वाला-पूर्व चमक (प्री-फ्लेयर ट्रांजिएंट इवेंट्स) उसी स्थान के आसपास केंद्रित पाई गईं, जहां बाद में बड़ी सौर ज्वाला उत्पन्न हुई। परिणाम बताते हैं कि बार-बार छोटे पैमाने पर ऊर्जा का निकलना सक्रिय क्षेत्र में चुंबकीय क्षेत्र को अस्थिर कर सकता है, जिससे अंततः एक बड़ी सौर ज्वाला उत्पन्न होती है। मणिपाल सेंटर फॉर नेचुरल साइंसेज और इसरो के वैज्ञानिकों के नेतृत्व में किया गया यह अध्ययन भारत के प्रमुख सौर मिशन आदित्य-एल1 के बढ़ते वैज्ञानिक प्रभाव को प्रदर्शित करता है।