क्या अफसरशाही ही इस देश की वास्तविक नियंता है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में उत्तरदायित्व की अवधारणा सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। कहा जाता है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है। लेकिन क्या यह वास्तव में सच है? आज का भारत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां जवाबदेही का सवाल बार-बार उठता है, लेकिन उसके तार अक्सर शासन के शीर्ष गलियारों से लेकर नौकरशाही के अदृश्य जाल में उलझकर रह जाते हैं। हालिया परिदृश्य में दिल्ली में पुलिस के आचरण से लेकर देश भर में नीट पेपर लीक और झारखंड जैसे राज्यों में व्याप्त परीक्षा माफियाओं तक, हर जगह एक ही प्रश्न अनुत्तरित है: आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर बार बार यह सवाल उठता है लेकिन हर बार गोल पोस्ट बदलकर इस सवाल को मैदान से बाहर कर दिया जाता है। ऊपर से किसी मुद्दे पर अगर पर्दा डालना हो तो सीबीआई जांच का हवाला दिया जाता है। अब भागलपुर के सृजन घोटाला के नौ साल बीत जाने के बाद भी सीबीआई ने कौन से तीर मारा है, यह बड़ा सवाल है। लेकिन जिस पैसे का गबन हुआ वह किसी की जेब का नहीं बल्कि जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा था।
संसद में जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अनुपस्थिति पर विपक्ष सवाल उठाता है, तो यह केवल एक नेता की गैर-मौजूदगी का मामला नहीं होता, बल्कि यह उस संस्थागत जवाबदेही की कमी का प्रतीक है जिसे जनता ने सौंपा था। विपक्ष का दिल्ली पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाना और जिम्मेदारी तय करने की मांग करना एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी है। लेकिन जब सरकार के शीर्षस्थ चेहरे—चाहे वह प्रधानमंत्री हों या अन्य प्रमुख मंत्री—संसद में कठिन प्रश्नों का सामना करने के बजाय चुप्पी साध लेते हैं, तो यह व्यवस्था में एक बड़ा शून्य पैदा करता है।
नीट पेपर लीक का मामला इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। कुछ प्यादों को गिरफ्तार कर लिया गया, कुछ अधिकारियों के तबादले कर दिए गए, लेकिन मुख्य अपराधी कौन है? सिस्टम की जड़ में बैठा वह कौन सा तंत्र है जो मेधावी छात्रों के सपनों को नीलाम कर रहा है? यही स्थिति झारखंड में पेपर लीक के खिलाफ चल रहे आंदोलनों में भी दिखाई देती है। एल. खियांग्ते जैसे अधिकारियों की गिरफ्तारी तो होती है, लेकिन व्यवस्थागत बदलाव का कोई नामो-निशान नहीं मिलता। हमारे देश की नौकरशाही का असली कमाल यह है कि वह जिम्मेदारी के दायरे से बाहर रहना बखूबी जानती है।
देश में पुल ढहने से लेकर सड़कों के धंसने तक, चाहे कितनी भी बड़ी तबाही क्यों न हो, किसी न किसी अधिकारी की लापरवाही प्रत्यक्ष दिखती है, फिर भी कोई उच्च अधिकारी कभी जवाबदेह नहीं ठहराया जाता। ऐसा क्यों? दरअसल, यह नौकरशाही का वह अदृश्य कवच है जो एक अफसर को दूसरे अफसर से जोड़ता है। जब एक अधिकारी मुश्किल में फंसता है, तो पूरा प्रशासनिक तंत्र उसे बचाने के लिए एकजुट हो जाता है। फाइलें आगे-पीछे घुमा दी जाती हैं, कानून की ऐसी व्याख्याएं की जाती हैं जिनसे अपराध का स्वरूप ही बदल जाए। इसे अक्सर तकनीकी कमी का नाम देकर दबा दिया जाता है।
लोकतन्त्र के नाम पर हम जिस व्यवस्था का पोषण कर रहे हैं, उसमें असली शक्ति जनता के प्रतिनिधियों के पास नहीं, बल्कि उस ब्यूरोक्रेसी के पास है जो कभी चुनाव नहीं लड़ती, कभी हारती नहीं, और जो आम आदमी के टैक्स के पैसे पर पलकर खुद को सर्वशक्तिमान मानती है। हमारे नीति-निर्माता अक्सर चुनाव जीतने के लिए कानून की रचना करते हैं, लेकिन उन कानूनों का क्रियान्वयन जिस अफसरशाही के हाथ में होता है, वह उसे अपने फायदे के अनुसार तोड़-मरोड़ लेती है।
एक आम गरीब नागरिक दिन-रात मेहनत करके टैक्स भरता है, अपनी खून-पसीने की कमाई से देश के खजाने को भरता है, ताकि उसे बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा मिल सके। लेकिन परिणाम क्या मिलता है? महंगाई, असुरक्षा, लीक होते पेपर और ढहती बुनियादी संरचनाएं। इस पूरी प्रक्रिया में गरीब और गरीब होता जा रहा है, जबकि अफसरशाही की सुख-सुविधाएं निरंतर बढ़ रही हैं।
जिम्मेदारी के सवाल पर हमारे नेता अक्सर फंसते हुए दिखते हैं, लेकिन वे अंततः अफसरशाही की ढाल के पीछे सुरक्षित निकल जाते हैं। लोकतंत्र में जवाबदेही ऊपर से नीचे की ओर होनी चाहिए। यदि हम सच में एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में रहना चाहते हैं, तो हमें अधिकारी-नेता के इस गठजोड़ को तोड़ना होगा। इसके लिए न केवल सख्त कानूनों की जरूरत है, बल्कि एक ऐसी स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था की भी आवश्यकता है जो किसी भी स्तर के अधिकारी को उसकी गलतियों के लिए सीधे दंडित कर सके। इसके बिना इस सड़ी गली व्यवस्था में असली गुनहगारों के बच निकलने का रास्ता हमेशा ही खुला रहेगा और जनता मुर्ख बनती रहेगी।