इस कारोबार पर भी ट्रंप की सोच की छाया
अमेरिका को इससे नुकसान का अंदेशा
व्यापार संधि की चर्चा अब भी जारी है
ट्रंप अपना लाभ देख फैसला लेते हैं
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। इसी संवेदनशील और रणनीतिक दौर के बीच, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने हाल ही में संसद में एक नया और दूरगामी विधेयक पेश किया है। इस प्रस्तावित विधेयक के कानून बन जाने के बाद, देश के बैंकों और विभिन्न भुगतान प्रणाली प्रदाताओं (पेमेंट सिस्टम प्रोवाइडर्स) को लोकप्रिय डिजिटल भुगतान माध्यमों जैसे कि यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के माध्यम से किए जाने वाले भुगतानों पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट या सेवा शुल्क वसूलने की कानूनी अनुमति मिल जाएगी।
सतही तौर पर देखने पर ऐसा लग सकता है कि भारत के घरेलू भुगतान ढांचे से जुड़ा यह वित्तीय निर्णय और भारत-अमेरिका का व्यापार समझौता दो बिल्कुल अलग और स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं। हालांकि, इसके कूटनीतिक और आर्थिक निहितार्थ काफी गहरे हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंचों पर लगातार यह कड़ा रुख अपनाया है कि उसके सभी प्रमुख व्यापारिक साझेदार देश अपने यहां के डिजिटल लेनदेन पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) में एक समान, निष्पक्ष और पारदर्शी प्रतिस्पर्धा का माहौल यानी लेवल प्लेइंग फील्ड तैयार करें।
अमेरिकी स्तर पर लंबे समय से यह आपत्ति जताई जाती रही है कि भारत में यूपीआई और रुपे जैसे डिजिटल भुगतानों पर पूरी तरह से शुल्क मुक्त व्यवस्था होने के कारण अमेरिकी क्रेडिट और डेबिट कार्ड कंपनियों (जैसे वीज़ा और मास्टरकार्ड) को भारतीय बाजार में असमान और कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है। अमेरिकी प्रशासन का यह दबाव प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भारत की घरेलू डिजिटल भुगतान नीतियों को प्रभावित कर रहा है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच चल रही व्यापारिक वार्ताओं के बीच संसद में इस नए शुल्क विधेयक का लाया जाना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसमें ट्रंप फैक्टर की एक बड़ी और छिपी हुई भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।