जबरन ताला तोड़कर कब्जा करने के खिलाफ शिकायत
नये प्रबंधन से सारी शिकायतें निकली
नया बैंक खाता भी नहीं खोला गया है
इसका सारी कमाई निजी जेबों में जा रही है
राष्ट्रीय खबर
रांची के महावीर चौक स्थित ऐतिहासिक एवं प्रसिद्ध दुर्गा मंदिर ट्रस्ट का प्रबंधन विवाद अब न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हो गया है। लंबे समय से चल रही खींचतान और स्थानीय पुलिस प्रशासन के समक्ष की गई शिकायतों पर उचित कार्रवाई न होने के कारण, ट्रस्ट के सचिव निशांत कुमार सिन्हा ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।
यह विवाद ट्रस्ट पर कथित रूप से अवैध कब्जा जमाने के आरोपों से शुरू हुआ है। शिकायत के अनुसार, विजय वर्मन और ट्रस्ट के लंबे समय से कोषाध्यक्ष रहे दीपक कुमार वर्मा ने मिलकर ट्रस्ट के प्रबंधन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है। आरोप है कि दीपक कुमार वर्मा ने अपने कार्यकाल के दौरान ट्रस्ट की आय और व्यय का कोई भी आधिकारिक ब्योरा प्रस्तुत नहीं किया है, जिससे वित्तीय पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
गौरतलब है कि पूर्व में इस ट्रस्ट का सुचारू संचालन निर्मल कुमार सिन्हा के कुशल निर्देशन में होता था। उनके निधन के बाद, जब उनके पुत्र निशांत कुमार सिन्हा ने विरासत को संभालते हुए उसी पारदर्शी प्रणाली को लागू करने का प्रयास किया, तो उन्हें कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ट्रस्ट की वार्षिक लाखों रुपये की आमदनी पर नियंत्रण बनाए रखने की मंशा रखने वाले इन कथित कब्जाधारियों द्वारा निशांत सिन्हा को बार-बार झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकियाँ दी जा रही हैं।
वित्तीय अनियमितताओं की फेहरिस्त यहीं समाप्त नहीं होती। आरोप है कि ट्रस्ट के आधिकारिक बैंक खातों का उपयोग करने के बजाय, बड़ी राशि नकद में ली जा रही है। मंदिर परिसर की बुकिंग और अन्य दान-पुण्य की राशि भी नियमों के विरुद्ध नकद में स्वीकार की जा रही है, जिससे ट्रस्ट की आर्थिक स्थिति का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
इन गंभीर आरोपों के मद्देनजर, निशांत कुमार सिन्हा ने झारखंड राज्य हिंदू धार्मिक न्यास बोर्ड को पूरे मामले से अवगत कराते हुए तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया है कि वर्तमान कब्जाधारी ट्रस्ट को तत्काल प्रभाव से भंग किया जाए और जन-सहयोग तथा नियमों के अनुरूप एक नई ट्रस्ट समिति का गठन किया जाए। चूंकि यह मंदिर शहर की आस्था का प्रमुख केंद्र है, इसलिए आम जनता की निगाहें भी अब न्यायालय के फैसले पर टिकी हैं। मंदिर की गरिमा और ट्रस्ट की संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए यह न्यायिक हस्तक्षेप अत्यंत अनिवार्य माना जा रहा है।