कभी-कभी खामोशी सबसे बड़ा शोर मचा देती है। देश के युवा, जिन्हें हम दशकों से स्मार्टफोन की स्क्रीन पर अंगूठा घिसते, रील्स देखते और मीम्स पर ठहाके लगाते देख रहे थे, वे अचानक गायब हो गए। न कोई ट्वीट, न कोई हैशटैग, न किसी वेब सीरीज पर बहस। यह वह खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा नहीं, बल्कि उस कुकर की सीटी जैसा थी जो फटने ही वाला है।
और फिर हुआ कॉकरोच जनता पार्टी का उदय। यह कोई साधारण पार्टी नहीं है। जिस तरह कॉकरोच का अस्तित्व परमाणु हमले के बाद भी बना रहता है, उसी तरह इस युवा ब्रिगेड ने यह साबित कर दिया है कि उन्हें सिस्टम की नफरत, महंगाई की मार या बेरोजगारी का कीटनाशक भी नहीं मार सकता। वे हर दीवार, हर मंत्रालय और हर सरकारी दफ्तर के कोने-कोने में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।
हम कहते आये थे कि कॉकरोच चाट लेता है। ठीक इसी तरह आधुनिक भारत के इन तेलचट्टों ने पहले धर्मेंद्र प्रधान और बाद में मोदी सरकार के आभामंडल को ही चाट लिया है। हर बार नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के लिए ढाल बनकर खड़े होने वाले चैनल और मीडिया भी इसकी लहर में पूरी तरह अपना असर खो चुका है। पहले के घटनाक्रमों की वजह से अब उनका असर नहीं रहा।
मोदी सरकार, जो अब तक विरोधियों को टुकड़े-टुकड़े या अर्बन नक्सल जैसे ब्रांडिंग के तगमे बांटकर जीतती आ रही थी, इस बार उलझ गई है। पहली बार एक ऐसा विपक्ष सामने है जो भाषण नहीं देता, जो प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करता, जो बहस नहीं करता। वे बस कॉकरोच की तरह हर फाइल में घुस जाते हैं। सरकार सोच रही थी कि वे विपक्ष के शेरों से लड़ेंगे, लेकिन यहाँ तो पूरा देश ही कॉकरोच हो गया है।
इसी बात पर एक चर्चित गीत की याद आ रही है। इस गीत को लिखा था रश्मि सिंह ने और संगीत में ढाला था जीत गांगुली ने। इसे अरिजीत सिंह ने अपना स्वर दिया था। गीत के बोल कुछ इस तरह हैं।
खामोशियाँ आवाज़ हैं तुम सुनने तो आओ कभी
छू कर तुम्हें खिल जाएँगी घर इनको बुलाओ कभी
बेकरार है बात करने को कहने दो इनको ज़रा
खामोशियाँ, तेरी मेरी खामोशियाँ
खामोशियाँ, लिपटी हुईं खामोशियाँ
क्या उस गली में कभी तेरा जाना हुआ
जहाँ से ज़माने को गुज़रे ज़माना हुआ
मेरा समय तो वहीं पे है ठहरा हुआ
बताऊँ तुम्हें क्या मेरे साथ क्या-क्या हुआ
खामोशियाँ एक साज़ है
तुम धुन कोई लाओ ज़रा
खामोशियाँ अल्फ़ाज़ है
कभी आ गुनगुना ले ज़रा
बेकरार है बात करने को
कहने दो इनको ज़रा
खामोशियाँ…
नदियाँ का पानी भी खामोश बहता यहाँ
खिली चाँदनी में छिपी लाख खामोशियाँ
बारिश की बूँदो की होती कहाँ है ज़ुबां
सुलगते दिलों में है खामोश उठता धुआँ
खामोशियाँ आकाश हैं
तुम उड़ने तो आओ ज़रा
खामोशियाँ एहसास हैं
तुम्हें महसूस होती हैं क्या
बेकरार है बात करने को
कहने दो इनको ज़रा
खामोशियाँ…
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहली बार है जब सत्ता का गणित पूरी तरह से फेल हो गया है। कॉकरोच जनता पार्टी के पास कोई नेता नहीं है, कोई मेनिफेस्टो नहीं है, बस एक गहरी, दर्दनाक और गुस्से भरी खामोशी है। यह उस युवा की खामोशी है जिसने पढ़ाई की, डिग्री ली, लेकिन अब वह चपरासी की नौकरी के लिए भी दस लाख की भीड़ में खड़ा है।
भाजपा का आईटी सेल भी हैरान है। वे किसे ट्रोल करें? वे किस पर निशाना साधें? आप एक आदमी को गाली दे सकते हैं, आप एक दल को बदनाम कर सकते हैं, लेकिन आप उस पूरी पीढ़ी को कैसे बदनाम करेंगे जो अब सिर्फ देख रही है?
खामोशियां गुनगुनाने लगीं – यह फिल्मी गाना आज की राजनीतिक परिस्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। कल तक जो युवा शांत थे, आज उनकी खामोशी में ही सत्ता के गिरने का संगीत सुनाई दे रहा है। सरकार के लिए चुनौती यह नहीं है कि KJP क्या करेगी, चुनौती यह है कि वे कुछ नहीं कर रहे। और सत्ता के गलियारों में कुछ न करने वाली चुप्पी से बड़ा डर और कोई नहीं होता।
मोदी सरकार के सामने अब चुनौती सिर्फ महंगाई या अर्थव्यवस्था नहीं है, चुनौती यह है कि यह कॉकरोच अब उनके आलीशान महलों की नींव में घुस चुका है। जब तक सरकार को इसका पता चलेगा, तब तक शायद मेजें खाली हो चुकी होंगी। और यकीन मानिए, इस खामोशी में कोई गुनगुनाहट नहीं, बल्कि आने वाले बदलाव का बड़ा शोर है। अब मजबूरी में खुद मोदी जी को हर रात लाइव प्रसारण करना पड़ रहा है। पर शायद वह उसपर आने वाली टिप्पणियों को नहीं पढ़े रहे हैं।